19.11.17

लोहे का घर-30

सुबह का समय है, लोहे के घर की खिड़की है और सामने हरे-भरे खेतों में दूर दूर तक फैली जाड़े की धूप। #ट्रेन छोटे छोटे स्टेशनों पर रुकती है, अपनी वाली की प्रतीक्षा में खड़े लोग दिखते हैं फिर ट्रेन चल देती है। लगभग हम उम्र पॉच बच्चों के साथ बैठी एक देहातन देर तक याद आती है। लगता है कि कुछ जिंदगियां बड़ी देसी टाइप की होती हैं। जाड़े में मां के साथ बच्चों के झुण्ड गली-गली दिख ही जाते हैं।
लोहे के घर में रोज के यात्री किसी विषय पर बहस कर रहे हैं और बाहर सामने की पटरी से एक डाउन ट्रेन हारन बजाती गुजर रही है। इंजन के शोर के बाद अपनी गाड़ी की खटर-पटर अच्छी लग रही है। बड़े शोर के बाद छोरा शोर अच्छा लगता है। पटरी पर चल रही है अपनी गाड़ी।
खेतों में धान की कटाई जोरों पर है। दूर दूर तक फैले कटे धान क ढेर और अधकटी फसलों पर सूर्य की किरणें धमाल मचा रही हैं। इन्हें देख-देख परिंदों के साथ-साथ हम भी खुश हैं लेकिन किसान और उसका परिवार चिंतित। तैयार फसल को ठिकाने लगाने की कड़ी मेहनत से जूझ रहा किसान प्रसन्न कब होता है, हम क्या जाने! हमने कभी खेती तो करी नहीं। हमने तो बस लहलहाती फसलों की फोटोग्राफी का आंनद लिया है। जाके पैर न पड़ी बिवाई, ऊ का जने पीर पराई!
आम का एक बाग गुजरा है। एक पुल पर चढ़ रही है ट्रेन। शांति से सो रही थी नदी। कम पानी की वजह से बीच में उभर आए रेत पर बैठ मस्ती कर रहे थे गांव के लड़के। एक नाव खड़ी थी किनारे। किनारे-किनारे नदी पर तैर रही घने वृक्षों की परछाइयां नदी को और भी मैली दिखा रही हैं।

आज सुरुज नरायण आदमियों की करनी से चित्त हो गए दिखते हैं। लोहे के घर की खिड़की से दिखने वाले खेतों में न धूप है न किरणें। ऐसा लगता है कि दोनो बहने डर गई हैं। आकाश में बादल नहीं हैं फिर भी उतर नहीं पा रहीं धरती पर।

अभी शाम के साढ़े पाँच बजा चाहते हैं लेकिन धुंध इतनी है कि लगता है शाम ढल गई। लोहे के घर की खिड़की से धुंध में डूबे खेत दिख रहे हैं। झुग्गी-झोपड़ी और दूर खेतों के बीच उग आए कंकरीट के घरों में जल चुके हैं बल्ब। साथी कह रहे हैं यह कोहरा नहीं, धुंध है। कोहरा होता तो हवा में दिसम्बर वाली ठंडी होती।
जाड़े के मौसम में जब घने कोहरे के कारण ट्रेने अत्यधिक लेट हो जाती हैं, तो एक दिन पहले वाली या सुबह वाली #ट्रेन अकस्मात नेट में अवतरित हो जाती है। यही हाल आज का है। अपनी रोज की सभी ट्रेने अत्यधिक लेट हैं, भोर में आने वाली बरेली एक्सप्रेस शाम को मिल गई।
अब खेत अंधकार में डूब चुके हैं। घर के भीतर रौशनी है। बोगी में भीड़ कम है। ज्यादातर रोज के यात्री ही दिखलाई पड़ रहे हैं। कोई ऊँघ रहा है, कोई मोबाइल चला रहा है। घर के बाहर चारों तरफ उजाला फैला हो, घर भले अंधेरे में डूबा रहे, कोई बात नहीं। मन में उजाला हो, आँखें भले अंधकार में डूबी रहें, क्या फ़र्क पड़ता है! यहाँ स्थिति थोड़ी विपरीत है। घर में उजाला है और बाहर अँधेरा। मन में निराशा है और आँखें उजाले में डूबी हुई।
शोर भी सुनाई पड़ रहा है। उस तरफ बैठे साथी देश की चिंता में हैं। देश की चिंता में शोर होना स्वाभाविक है। मीडिया भी टी.वी. चैनलों में विद्वानों को बुलाकर देश की चिंता करती है। खूब शोर होता है फिर सभी हँसते हुए घर जाते हैं। उस तरफ बैठे यात्री भी अब खिलखिला कर हँस रहे हैं। लगता है देश की चिंता कर चुके।
आज मिली लेट ट्रेन अभी तक बढ़िया चल रही है। 

आज पाँच बजे के आसपास जौनपुर से बनारस जाने वाली चार चार ट्रेने हैं। जो मर्जी वो पकड़ो। खुदा जब देता है, छप्पर फाड़ के देता है। यह अलग बात है कि कोई कल वाली है, कोई आज सुबह वाली। मजे की बात यह है कि रोज के यात्री रेल मंत्री को धन्यवाद दे रहे हैं। घंटों लेट यात्री जितना रेलवे को कोस रहे होंगे उससे ज्यादा तो अपने समय पर ट्रेन पकड़ पाने के लिए धन्यवाद मिल रहा है!
यह कोलकोता जम्मूतवी सियालदह एक्सप्रेस है। रात 12 बजे के आसपास जौनपुर से जाती है। अभी शाम 5.15 में चली है। रेल पटरी पर एक के पीछे दूसरी लगी हैं। एक्सप्रेस ट्रेन हर स्टेशन पर पैसिंजर की तरह रुक रही है। आगे प्लेटफॉर्म खाली ही नहीं है तो पीछे वाली आगे कैसे बढ़ेगी?
बोगी में अंधेरा था। दूसरे यात्रियों ने बताया कि कल से अँधेरा है। रोज के यात्रियों ने रॉड घुमाया तो सब रॉड जल गये। अब उजाला हो गया। अब सभी अपनी अपनी बीमारी के हिसाब से अपने अपने धंधे में लग गए। कोई बर्थ खाली देखकर लेट गये, कोई मोबाइल में पुराना क्रिकेट मैच/वीडियो देख रहे हैं, कुछ देश की चिंता कर रहे हैं, कुछ तास खेल रहे हैं और हम लोहे के घर की कहानी।
ट्रेन रुक रही है, चल रही है। लोग खुश हो रहे हैं, दुखी हो रहे हैं। पटरी पर चल रही है सभी की गाड़ी।

शाम ढल चुकी है। लोहे के घर में वेंडर भेज और नानभेज खाने का आर्डर ले रहे हैं। दो पीस मच्छी और भात 140 रुपये में। मछली रोहू बता रहा है। मेरे साथ मालदा तक जाने वाले लड़के बैठे हैं। खूब पूछताछ के बाद भी यह कहकर नहीं लिए कि महंगा है। पता नहीं सही रेट क्या है!
यह दिल्ली से मालदा जाने वाली फरक्का है। इसमें बंगाली अधिक हैं। मोबाइल में गाने भी बंगाली बज रहे हैं। मालदा कब पहुँचेगी पूछने पर एक लड़का कहता है ..पता नहीं। मुझे लगा मेरा प्रश्न ही वाहियात था। भारतीय रेल कब कहाँ पहुँचेगी यह भी पूछने की बात है! जब मिल जाय तब चढ़ लो, जब पहुँच जाओ उतर लो। झोले में दाना-पानी, गुण-भुजा बांध लो। मोबाइल चार्ज करने की व्यवस्था टंच रहे फिर क्या चिंता? गाते-बजाते पहुँच ही जाओगे। महंगा माछी-भात कितनी बार खाओगे? दो-दिन का सफर तीन दिन में क्या हर्ज है? रेलवे कोई एक्स्ट्रा किराया थोड़ी न लेती है!
वेण्डर भी कई प्रकार के आते हैं। अंडा-चावल, सब्जी- चावल वाले खाना, खाना, खाना.....चीखते आ/जा रहे हैं। इतने खिलाने वाले हैं फिर #ट्रेन लेट होने की क्या चिंता।

आपको पता है, मुझे पता है लेकिन क्या सभी बच्चों को पता है कि आज उनका दिन है? स्कूल जाने वाले बच्चे गहरी सांस लेंगे टेबल या बेंच पर अपने बस्ते का भारी बोझ पटक कर तब शायद उन्हें बता देंगे गुरुजी कि आज बाल दिवस है। सुनकर वे खुश होंगे और चाचा #नेहरूको मिस करेंगे या फिर जल्दी-जल्दी याद करेंगे चाचा की जीवनी! क्या सभी बच्चे जा पाते हैं स्कूल?
#लोहेकेघर में एक बच्चा पैर छू कर भीख मांग रहा है। न उसे पता है कि आज बाल दिवस है न उसे जिसने डाँट कर भगा दिया बच्चे को!
पटरी पटरी प्लास्टिक के टुकड़े बीन कर सीमेंट के खाली झोले में भरने वाले बच्चों को भी नहीं पता कि आज बाल दिवस है।
पानी की बोतल बेचने के लिए चलती ट्रेन से कूद कर उस पटरी पर खड़ी #ट्रेन पर चढ़ने वाले बच्चे को भी नहीं पता।
देव दीपावली के मेले में जब चारों ओर घाटों पर जल रहे थे दिए कुछ बच्चे बेच रहे गुब्बारे! आज क्या वे मना रहे होंगे बाल दिवस?
आज सुबह चाय की दुकान पर गिलास धो रहे बच्चे को तो पक्का नहीं पता था।
माँ के साथ महुए के पत्तों की गठरी सम्भाले रेल की पटरी पार करते बच्चों को भी नहीं पता।
और तो और मुझे ही कहाँ पता था? वो तो फेसबुक में नेहरू-एडविना के प्रेम प्रंसग पर परसाईं का लेख पढ़ा तो याद आया कि आज बाल दिवस है!

चीटियों की तरह एक के पीछे दूसरी पंक्ति बद्ध हो, खरगोश की तरह टेसन-टेसन फुदकती चल रही हैं सभी ट्रेनें। सुपर फास्ट पैसिंजर को क्रॉस नही कर सकती क्योंकि हर टेसन के मेन लाइन पर खड़ी है मालगाड़ी। किसे पता था कि समाजवाद ऐसे भी लाया जा सकता है!

जौनपुर सीटी स्टेशन पर रोज के यात्रियों का उत्साह देखते ही बनता है..बेगम पूरा आ गई! बेगम पूरा आ गई! का शोर गूंजा और जम्मूतवी से चलकर बनारस जाने वाली ट्रेन जो दिन में ११ बजे के आसपास आती है, शाम ६.४५ में सीटी स्टेशन आ गई। सुल्तानपुर से बहुत जल्दी आ गई थी शायद इसलिए चलकर जफराबाद में इत्मीनान से रुकी है। अगल-बगल दो ट्रेनें खड़ी हैं। बाईं तरफ अप वाली पटरी पर सुबह आने वाली दून और दाईं तरफ गाजीपुर जाने वाली पैसिंजर। अपनी वाली बनारस तक नॉन स्टॉप है। सभी की देखा देखी यह भी रुक गई या और कोई कारण भगवान जाने!
#ट्रेन अब हवा से बातें कर रही है। अनावश्यक खड़ी ट्रेन जितनी बुरी लगती है, हवा से बातें करती उतनी ही हसीन। अब बड़ी प्यारी लग रही है अपनी बेगमपुरा।
गाड़ी रुक जाए तो बड़ी तकलीफ होती है, पटरी पर चलती रहे तो जीवन में आंनद रहता है। गाड़ी जब तक चलती रहती है लोहे के घर के सभी सदस्य अपनी-अपनी मस्ती में रहते हैं। निश्चिंत भाव से कोई मोबाइल में वीडियो देख रहा होता है, कोई राजनैतिक बहस में शामिल हो, देश की चिंता करने लगता है, कोई बैठे-बैठे ऊंघने/सोने लगता है। और तो और बेचन आत्मा भी चिंता छोड़ गीत गाने लगता है!
गाड़ी भले पटरी पर हो, अनावश्यक रुक जाए तो बड़े से बड़े धैर्यवान के भी धैर्य का बांध टूट जाता है। बेचैन हो खिड़की/दरवाजे से सिगनल झांकने लगता है। गाड़ी फिर पटरी पर चल पड़ती है, फिर खुश हो जाता है।
भारतीय रेल अपने देशवासियों को धैर्यवान बनाती है। जीवन जीने का फलसफा सिखाती है। रेलवे दर्शन को भी दर्शन शास्त्र में शामिल कर विश्वविद्यालयों में शोधपत्र लिखवाया जाय तो जीवन जीने के कई नए विचार प्रकाशित हों।
घर के लोग अभी फ़िर दुखी हुए हैं। किसी ने चेन पुलिंग करी है। चेन खींचने वाला बन्दा पटरी के उस पार भागा जा रहा है। अंधेरे में कोई उल्लू चीख रहा है... अपना उल्लू सीधा, भाड़ में जाए जनता!

लोहे के घर की बायीं तरफ वाली खिड़की के पास बैठ बनारस से जौनपुर की यात्रा में ट्रेन जब भुतहे बंगलों से आगे निकल आउटर पार होती है तब दिखती है 39 जी टी सी..गोरखा रेजीमेंट की लंबी बाउंड्री और बाउन्ड्री के भीतर दूर दूर तक फैले बबूल के जंगल। धीमी होती है #ट्रेनकी रफ्तार और देर तक दिखते हैं बबूल के जंगल। शायद सुरक्षा की दृष्टि से लगाये गए होंगे कि न आ पाए कोई, सैनिक छावनी तक।
सोचता हूँ काश ये जंगल बबूल के न होते! नीम, बरगद या पीपल के होते तो कितना अच्छा होता! बबूल के काँटे न होते, शांति की शीतल छांव होती। क्या जरूरी है सुरक्षा के लिए बबूल की बाड़? शहर के मध्य है यह जंगल। आम आदमी वैसे भी ऊँची बाउन्ड्री के भीतर नहीं घुस सकते। हाय! शायद जरूरी होता है सैनिकों के युद्धाभ्यास के लिए कंटीला वातावरण।
सोचता हूँ...देस ही न होते, सैनिक ही न होते, बबूल ही न होता तो कितना अच्छा होता!

मात्र 31.24 घण्टे लेट है #कोटा_पटना। कल सुबह आनी थी, आज शाम को जौनपुर के भंडारी स्टेशन पर 10 मिनट से खड़ी है। हम इस उम्मीद से बैठे हैं कि खड़ी है तो चलेगी भी। आखिर चलने के लिए ही तो आई है! जनरल में भीड़ है लेकिन स्लीपर की बोगियाँ खाली-खाली हैं। स्लीपर वाले आधे यात्री उतर कर भाग गये लगते हैं। उनके पास सड़क से जाने का पैसा होगा। जनरल वाले कहाँ जाते। एक दूसरे से चप चपा कर बैठे हैं। जो बैठ नहीं पाए हैं वे खड़े हैं। बिना टिकट के यात्रा की सुविधा सिर्फ पैसिंजर या जनरल बोगी में ही तो मिलती है! भीड़ भाड़ वाले जनरल डिब्बों में टी टी क्यों जाएं? परेशानी के सिवा क्या मिलेगा वहाँ?
भंडारी से एक टेसन आगे जफराबाद तक सिंगल पटरी है। पटना से आने वाली कोटा पटना उधर से आ रही है। जब वह आएगी तब यह चलेगी। अपनी वाली इत्मीनान से खड़ी हो, ग्रीन सिगनल की प्रतीक्षा कर रही है। सिंगल ट्रैक में यही होता है। एक स्पेस देगा तो दूसरी को मौका मिलेगा। आजकल के बच्चे शायद इसीलिए #सिंगल रहना चाहते हैं। एक फ़िल्म आई है 'करीब करीब सिंगल' । अभी फ़िल्म नहीं देखा, पोस्टर देखा है। दो ट्रेनें अगल बगल खड़ी हैं और दोनो की खिड़कियों से हीरो हीरोइन हाथ उठाते हुए एक दुसरे को कुछ इशारे कर रहे हैं। उधर से आने वाली पटना कोटा आ गई। किसी खिड़की से हीरोइन नहीं झाँक रही। झाँकती होती तो बोल देता ..मैं भी करीब करीब सिंगल हूँ। बच्चे बड़े हो चुके। थका मांदा घर जाता हूँ, बुढ़िया भाव खाती है, भाव नहीं देती। हाय! लंबी प्रतीक्षा के बाद उधर वाली से कोई झाँकी, मेरी वाली #ट्रेन चल दी। हम फिर करीब करीब सिंगल के सिंगल रह गए।
आधे घण्टे बाद अब पटरी पर चल रही है अपनी गाड़ी। मेरे साथ अगल बगल सब सिंगल पुरुष ही हैं। कोई लेटा है कोई बैठा है। कोई दोनो टाँगे उठाकर ऐसे लेटा है जैसे इस आसन में घर में सोता मिल गया तो पत्नी बेलन से पीटती हो! कोई एक हाथ से सर टिकाए विष्णु भगवान के शेषनाग आसन की तरह दाएं करवट लेटा है और बाएं हाथ से मोबाइल में पुराने क्रिकेट मैच का वीडियो देख रहा है। मेरे बगल में बैठे मोटे सरदार जी सामने वाली बर्थ पर दोनों टाँगे फैलाये, दोनो हाथों से मोबाइल पकड़े कोई फिलिम देखने में लीन हैं।
भंडारी से छूटने के बाद ट्रेन करीब करीब अच्छी चली। लगता है बनारस आउटर पर जाकर ही दम तोड़ेगी। हाय! किसी ने चेन पुलिंग कर दिया। ट्रेने यूँ ही थोड़ी न लेट होती है।


लोहे का घर-29

आज छठ की भीड़ है लोहे के घर में। साइड अपर में सामानों के बीच चढ़ कर बैठ गए हैं हम। सामने एक महिला ऊपर के बर्थ पर दो बच्चों को टिफिन में रखा दाना चुगा रही हैं। चूजे कभी इधर फुदकते हैं, कभी उधर। गिरने-गिरने को होते हैं कि मां हाथ बढ़ाकर संभाल लेती हैं। बगल के बर्थ में एक लड़का घोड़ा बेच कर सो रहा है। जफराबाद में ट्रेन रुकी, ८-१० और यात्री चढ़ कर बैठने का जुगाड तलाश रहे हैं। नीचे के दोनो बर्थ पर कोहराम है। छोटे-छोटे पांच बच्चे, दो महिलाएं और चार पुरुष आपस में गड्डमगड्ड हैं। खाना बेचने वाला भी खड़ा है, यात्रियों के साथ। आवाज़ लगा रहा है-'सब्जी-भात, डिम- भात, मछछी-भात।' डिंबा से डिम बना हो शायद! अंडा को डिम बोल रहा था हाकर। कोई-कोई खरीद भी रहे हैं। जो खरीद रहे हैं वे खा भी रहे हैं। बगल वाले अपर बर्थ में एक महिला अपने बच्चे को चम्मच से अंडा-भात खिला रही है। खिलाते खिलाते मैंगो जूस बेचने वाले हाकर को रोक कर पूछ रही है-ऐ! पानी है?
एक आदमी और चढ़ कर मेरे बगल में बैठ गया है। इसे मालदा टाउन जाना है। बता रहा है कि हम छठ वाले नहीं हैं, बी एस एफ में हैं। छठ वाले वे लोग हैं। इसी भीड़ भाड़ वाले कोहराम में लोग मनोरंजन भी कर रहे हैं। नीचे एक आदमी मोबाइल में वीडियो देख रहा है। बच्चे लगातार 'चिल्ल-पों' मचाए हैं। बड़े उनको संभालने में लगे हैं। डिम-भात खाने वाले बच्चे को पानी की बोतल मिल गई है। पीने के बाद वो उसी बोतल से खेल रहा है। किसी स्टेशन पर रुक गई है ट्रेन। कुछ घबरा कर पूछ रहे हैं-बनारस कब आएगा?

बहुत काम बटोरा गया है लोहे के घर में। फोटोग्राफी किया जाय, किताब पढ़ा जाय या लिखा जाय? आज तो एक और मुसीबत आ गई। साथी ने तीन फिलिम भेज दिया मेरे मोबाइल में। गोलमाल अगेन के लालच में दो और आ गई। एक जान और कितना सारा काम!
लोहे के घर की खिड़की से सुबह फोटोग्राफी संभव है, शाम को नहीं। शाम को अभी दूर दूर तक अंधेरे में डूबा खेत और साथ साथ चलता एक टुकड़ा चांद ही नजर आ रहा है। मेरे मोबाइल कैमरे से इसकी तस्वीर नहीं ली जा सकती। दूर कंकरीट के जंगल से छिटके जुगनू की तरह टिमटिमाते बल्ब दिख रहे हैं। लोहे की अप #ट्रेन वाली पटरी पीछे भाग रही है, दूर टिमटिमाते बल्ब आगे-आगे दौड़ रहे हैं, इंजन हारन बजा रहा है और ऊपर नील गगन में टंगा-टंगा चांद साथ चल रहा है। कुल मिलाकर ऐसा लग रहा है कि धरती नाच रही है और ऊपर से चांद मजा ले रहा है!
आज भीड़ नहीं है लोहे के घर में। यह सूरत जाने वाली ट्रेन है। बिहार जाने वाली होती तो #छठकी भीड़ दिखती। बड़ा शांत वातावरण है। चांद गगन से उतर कर बगल में आ बैठता तो मामला रोमांटिक होता। पूनम का न सही, एक टुकड़ा चांद तो होता अपने पास। अभी भी ऊपर आकाश में टंगा है, वैसे का वैसा। मंजिल आएगी तो मुझे कंकरीट के अंधेरे में छोड़ गुम हो जाएगा। मन करता है चलता रहूं यूं ही, जब तक चांद साथ है।

#ट्रेन बड़ी देर से रुकी है। यह फास्ट ट्रेन है लेकिन लोग कह रहे हैं पीछे सुपर फास्ट आने वाली है, उसी को पास देगी। अच्छा है अभी #बुलेट नहीं चलती। चलती होती तो उसे भी पास देती। ताकतवर अपने से कमजोर को ऐसे ही दबाते हैं।
लोग ऊब कर अजीबोगरीब हरकत कर रहे हैं। एक सज्जन यू ट्यूब में सचिन की बैटिंग देख रहे हैं, कुछ ऊंघ रहे हैं, कुछ ट्रेन से उतरकर प्लेटफार्म पर टहल रहे हैं। एक गुट मूंगफली फोड़ चुकने के बाद इंजन की तरफ देखते हुए हाथ मल रहा है। मेरे अलावा कोई रुकने की खुशी नहीं मना रहा! सब दुखी हैं। जो मंजिल की चिंता में सफर का आंनद न ले पाएं उन्हें चलना ही नहीं चाहिए।
अंडा-चावल, सब्जी-चावल, चना, चाय बेचने वाले आ जा रहे हैं। ऐसे बोर वातावरण में इनकी बिक्री बढ़ जाती है। साहेब जब अधिक बोर होने लगते हैं तो उनकी भूख अनायास बढ़ जाती है। कुछ नहीं तो मिनरल वाटर ही खरीद लेते हैं। मजदूर बोर हो ते हैं तो सुर्ती रगड़ने लगते हैं।
सुपर फास्ट के जाने के दस मिनट बाद अपनी फास्ट भी पटरी पर दौड़ने लगी है। आकाश में टंगा कार्तिक का चांद अब आधा हो गया है। जब पूरा होगा तब दिवाली होगी अपने शहर में। इधर गंगा के घाटों पर दीप जलेंगे, उधर उस पार रेती से निकलेगा कार्तिक पूर्णिमा का चांद। देव भी आएंगे दिवाली मनाने। अभी आधा है चांद। गगन में तारे नहीं दिख रहे, अकेला है। साथ चल रहे यात्रियों की तरह अकेला।
मन करता है आधे चांद से बातें करूं। पूछूं कि टुकड़े टुकड़े पूरे होने में क्या आंनद है? धीरे-धीरे छोटे होने में कितनी तकलीफ होती है? छोड़ो! नहीं पूछता। मूर्ख कहेगा और ज्ञान बघारेगा..हम कब अधूरे हैं रे पगले? तू हमेशा देख ही नहीं पाता मुझे पूरा!
किसी ने चेन पुलिंग की है। रो रो कर रुकी है ट्रेन। अब चुप हुई। सरकार की तरह जोर से हारन बजाएगी और फिर छुक छुक करती चल देगी पटरी पर। चलती गाड़ी की चेन कोई खीच ले तो इंजन हारन बजाने के सिवा और कर भी क्या सकता है? जनता की याददाश्त बड़ी कमजोर होती है। जितनी देर तकलीफ होती है रोती/चीखती है, फिर भूल जाती है। ट्रेन फिर चल दी। लोग फिर खुश हो गए।

लोहे के घर में शाम तो होती है पर हर खिड़की को चांद नसीब नहीं होता। बाहर अंधेरा अंधेरा और अंधेरे के सिवा दूर दूर टिमटिमाते बल्ब ही दिख रहे हैं। चांद दूसरी तरफ है।
रुकी है #ट्रेन। इस स्टेशन पर रुकना नहीं चाहिए था मगर रुक गई। यही क्या कम है कि स्टेशन पर ही रुकी है? बीच जंगल में भी रुक सकती थी। उस पार प्लेटफार्म पर एक मरकरी लाइट जल रही है। जिसके प्रकाश के नीचे दो लोग इत्मीनान से बैठ कर बीड़ी सुलगा रहे हैं। शेष सब अंधकार में डूबा हुआ। छोटा स्टेशन है। छोटे स्टेशन पर ऐसा ही होता है। ट्रेन के रुकने से यहां के लोकल वेंडरों की किस्मत खुल गई है। अंडा चावल बेच रहे हैं। अभी चढ़े कुछ एक यात्री बहुत खुश हैं...आहा! रुक गई तो पकड़ लिए! भीतर बैठे जो यात्री ट्रेन के अनावश्यक रुकने से दुखी थे वे उनके चेहरे की खुशी देख रहे हैं। दुखी और सुखी की निगाहें चार हुईं। ट्रेन चल दी फिर दोनो में प्यार हो गया! अभी चढ़े यात्रियों में से एक ने कहा.. हें हे हे ..न रुकती तो कैसे पाते? मेरे मन ने कहा.. धन्य है भारतीय रेल! बहुतों को दुखी करती है तो बहुतों को खुशी भी देती है। दुखी यात्री, खुश यात्रियों की खुशी सहन नहीं कर पाते।
ट्रेन फिर रुक गई। यहां भी रुकना नहीं चाहिए था। अब हमारे साथ वे भी दुखी हैं जो पिछले स्टेशन पर ट्रेन के रुकने से चढ़ कर खुश थे! एक दो दूसरे खुशकिस्मत यात्री यहां से भी चढ़े हैं। पता नहीं यह खुशी किस चिड़िया का नाम है? अभी यहां तो अभी वहां! एक ही सफर में कितने प्रकार के लोग यात्रा करते हैं! कभी कभी तो लगता है हाड़ मांस से बना यह शरीर भी लोहे के घर के समान है और बेचैन_आत्मा एक यात्री

ट्रेन लेट है। लेट होने की वजह से हम इस ट्रेन में हैं। राइट होती तो 3.45A.M. में चली जाती। अब 6 बजे चली है तो मिल गई। यह न मिलती तो दूसरी मिलती। इसके मिलने से थोड़ा आराम हो गया। रेलवे को धन्यवाद देना तो बनता है। डायरेक्ट #बनारस पहुंचाने वाली ट्रेन है मगर पूरी उम्मीद है कि हर स्टेशन पर रुकेगी और बहुत से यात्री रेलवे को धन्यवाद देंगे।
हिजड़ों का दल घुसा है बोगी में। खूब ताली पीट पीट कर पैसे ऐंठ रहा है। हमसे नहीं मांगेगा। कहता है..'ये रोज के यात्री हैं, #स्टाफ के है!' जो मर्दानगी से पैसे न दे उसे ये अपने स्टाफ का, मतलब #हिजड़ा समझते हैं!
ट्रेन हवा से बातें कर रही है। जब मस्त चाल से चलती है तो झूला झुलाती है। प्लेटफॉर्म पर नहीं रुकती, पटरियां बदलती है, तो लोहे के घर के यात्रियों के जिस्म हिल्लम- डुल्लम होते हैं। कोई तोंदू नहीं बैठा अपने आस पास वरना ऐसे में उसकी तोंद देखने का मजा आता।
तारीफ किया तो पटरी पर रेंगने लगी ट्रेन! तारीफ पा कर कौन नहीं इतराने लगता है? एक कविता अख़बार में छपने पर नौसिखिया अपने को कवि मान लेता है, प्रशंसा पा कर भ्रष्ट अधिकारी भी खुद को विक्रमादित्य समझने लगता है, यह तो ट्रेन है। ठुनक कर रुकी, फिर इंजन ने सीटी बजाई तो साथ-साथ चल दी।
पुल से गुजरी है ट्रेन। उसके थरथराने की आवाज गूंज रही है कानों में। हमेशा की तरह शांत थी नदी। मछलियों को भी शोर शराबे की आदत पड़ चुकी है। नदी हो या व्यवस्था छोटे मोटे थरथराहटों से तनिक भी नहीं घबराती। पुल ढह जाए या ट्रेन उलट जाए तो थोड़ी देर के लिए हलचल होती है नदी में। कुछ समय बाद गाड़ी फिर पुरानी पटरी पर चलने लगती है।
ट्रेन फिर रुकी। कुछ और यात्रियों को ट्रेन में चढ़ने का अवसर मिला। #रेलवे को फिर धन्यवाद मिला। विलम्ब के लिए खेद प्रकट करने पर कितना धन्यवाद मिलता है रेलवे को! रुकी ट्रेन में #वेंडर फिर आए। ठंडा पानी, मसाला चाट, मैंगो जूस। ये मैंगोजूस जाड़े में भी बिकता रहेगा क्या? लगता है लोगों के स्वभाव में ही नहीं टेस्ट में भी बहुत फ़र्क आ गया है। जाड़े में आइस्क्रीम और चाव से खाते हैं!
मोबाइल में सेक्सी गाना बज रहा है मगर लोग उदासीन भाव से सुन रहे हैं! पहले हिरोइन के सर से जरा सा आंचल सरक जाने पर पूरा बदन थरथराने लगता था, अब रश्के कमर ..मजा आ गया... सुनकर भी उदासीन! सही कहता है हिजड़ों का दल...ये स्टाफ के लोग हैं!

16.9.17

रेलगाड़ी

रेलगाड़ी में बैठ कर रेलगाड़ी पर व्यंग्य लिखने का मजा ही कुछ और है। बन्दा जिस थाली में खायेगा उसी में तो छेद कर पायेगा। दूसरा कोई अपनी थाली क्यों दे भला? पुराने देखेगा और नया बनाकर सबको दिखायेगा। ट्रेन में चलने वाले ही ट्रेन को समझ सकते हैं। हवा में उड़ने वाले जमीनी हकीकत से कहाँ रू-ब-रू हो पाते हैं!

हमारे लिए तो रेलगाड़ी #ट्रेन नहीं, लोहे का घर है। एक ऐसा घर जिसमें सभी प्रकार के कमरे हैं। गरीबों के लिए, अमीरों के लिए और मध्यमवर्गीय के लिए अलग-अलग कमरे हैं। जैसी भारत की अर्थव्यवस्था वैसे रेलगाड़ी में कमरे । सभी धर्म और जातियों के लोग अपने मन की कलुषता छुपा कर, एक दूसरे से मुस्कुरा कर बातें करते पाये जाते हैं। एक ऐसा घर जहाँ भारत बसता है।

डबल बेड नहीं होता लोहे के घर में। लोअर, मिडिल और अपर बर्थ होते हैं। लोअर बर्थ ही दिन में गप्प लड़ाने वालों की अड़ी, रात में सिंगल बेड बन जाती है। जब तक जगे हो चाहे जितना चोंच लड़ाओ, रात में सिंगल ही रहो। सिंगल ही ठीक है, बेड डबल हुआ तो बवाल हो जाएगा।

मैं चाऊ-माऊ, जापान या यूरोप की बात तो नहीं जानता मगर भारतीय रेल धैर्य और साहस की कभी खत्म न होने वाली स्थाई पाठशाला है। भारतीय रेल में अधिक सफर करने वाला सहनशीलता के मामले में #गांधीवादी हो जाता है। कोई एक गाल में थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल झट आगे करने को तैयार! पहली बार रेलगाड़ी में सफर करने वाला व्यक्ति अव्यवस्था को देख भगत सिंह भले हो जाय, रोज-रोज सफर करने वाला गाँधी जी के बन्दर की तरह बुरा न देखो, बुरा न बोलो, बुरा न करो बड़बड़ाने लगता है।

इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि सहनशीलता की शिक्षा महात्मा गाँधी को दक्षिण अफ्रीका में रेलगाड़ी के सफर के दौरान मिली हो! क्या जाने उस समय दक्षिण अफ्रीका की रेलगाड़ी आज के भारतीय रेल की तरह प्रगति के पथ पर दौड़ती रही हो!

जैसे हर सफल पुरुष के पीछे कोई स्त्री होती है वैसे ही हर लेट ट्रेन के आगे एक मालगाड़ी होती है। लोग नाहक रेलगाड़ी को गाली देते हैं जबकि  रेलगाड़ी के लेट होने, हवा से बातें करने या पटरियों से उतर जाने के पीछे खुद रेलगाड़ी का कोई दोष नहीं होता। हानी, लाभ, जीवन, मरण सब ऊपर वाले की मर्जी पर होता है। इस सत्य को जान कर भी जो ट्रेन को गाली देते हैं उनको नादान ही समझना चाहिए।

जिसे हम अंग्रेजों का गिफ्ट मानते हैं वह भारतीय रेल अंग्रेजों द्वारा देश का माल लूटने की योजना का परिणाम हो सकती है। पहले मालगाड़ी बनाया फिर मालगाड़ी के लिए बनी पटरियों पर रेल दौड़ा दी। अब अंग्रेजों को क्या पता था कि आगे चलकर देश को आजाद कराने में और आगे विभाजन के समय भी रेलगाड़ी का खूब प्रयोग होगा!

दूसरे देशों में रेल भले पटरी पर चलती हो, भारतीय रेल हमेशा प्रगति के पथ पर दौड़ती है। प्रगती का पथ आप जानते हैं काटों भरा होता है। शायद यही कारण है कि अंग्रेजों द्वारा बनाई सभी सिंगल ट्रैक को हम आज तक डबल ट्रैक में नहीं बदल पाए।

बनी बनाई पटरी छोड़, निरन्तर प्रगति के पथ पर दौड़ रही है भारतीय रेलगाड़ी। पितर पक्ष में भले होरी अपने झोपड़ी के लिए गढ्ढा नहीं खोद सकता, #बुलेट_ट्रेन की नींव पड़ गई! यह भारतीय रेल द्वारा अंध विश्वास को ठेंगा दिखाना है। लगे हाथों यह भी सिद्ध हुआ कि अच्छा काम करने का कोई शुभ मुहूर्त नहीं होता। गलत काम करने के लिए भले ज्योतिष/वकील से सलाह ले लो, सही काम करने के लिए सिर्फ नेक इरादा और साहस की आवश्यकता होती है।

जितनी बार आप रेलगाड़ी में सफर करेंगे, उतनी बार आपको कोई नया दर्शन प्राप्त होगा। आपको सिर्फ गाँधी जी या मोदी जी जैसी दूर दृष्टि और अदम्य साहस दिखाते  हुए रेलगाड़ी में सफर करना है। सफ़र नहीं कर सकते तो स्टेशन में चाय ही बेचिए, दिव्य दृष्टि होगी तो फर्श से अर्श तक पहुंचते देर नहीं लगेगी। सफर कर रहे हैं और किसी टी टी ने आपको रेल से धकेल दिया तो समझो पूरा कल्याण ही हो गया। बिना सफर किये शीघ्र मंजिल पाना है तो रेल में नहीं, पटरी पर बैठने की आवश्यकता है।

रेलगाड़ी और जीवन में गहरा साम्य है। खिड़कियों से बाहर झांको तो बदलते मौसम का एहसास होता है। मंजिल से पहले कई स्टेशन आते/जाते हैं। मंजिल के करीब जा कर एहसास होता है कि वो बचपन था, वो जवानी और यह बुढापा है। सबसे दुखदाई तो मंजिल के करीब पहुँच कर आउटर में खड़ा होना होता है। रेलगाड़ी के सफर में आउटर अंतिम पड़ाव होता है। कई यात्री तो आउटर में ट्रेन को छोड़कर ऐसे चल देते हैं, जैसे कोमा में गये जिस्म को छोड़कर उनकी आत्माएँ। कई मंजिल की प्रतीक्षा में बेचैन हो जाते हैं और कई सफर के हर पल का आनन्द उठाते हैं। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप जीवन की इस रेलगाड़ी को कैसे जीते हैं।

9.9.17

परहित सरिस धर्म नहीं भाई..

धर्म और अधर्म का अर्थ समझाते हुए तुलसी दास जी लिखते हैं...

परहित सरिस धर्म नहीं भाई। पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।।

परोपकार के बड़ा कोई धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट देने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है।

वे यहीं नहीं रुकते। आगे जटायू सन्दर्भ में लिखते हैं..

परहित बस जिनके मन माहीं।
तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।

दूसरों के हित के लिए जो अपने प्राण भी निछावर कर देते हैं उनके लिए संसार में कुछ भी प्राप्य शेष नहीं रह जाता। और स्पष्ट करते हुए लिखते हैं...

संत विटप सरिता, गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी।।
सन्त, वृक्ष, नदियाँ, पर्वत सभी का काम दूसरों पर परोपकार करना है। कोई अपने लिए नहीं जीता।

इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि प्रकृति का स्वभाव ही दूसरों का उपकार करना है। सूर्य, चन्द्र और धरती के समस्त पेड़-पौधे सभी दूसरों की भलाई के लिए बने हैं। स्वार्थ की भावना प्राणियों में ही दिखती है।

मैथिलीशरण गुप्त’ जी ने ठीक ही लिखा है...

“यह पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे ।
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे ।”

रहीम दास जी ने लिखा...

'वो रहीम सुख होत है, उपकारी के संग
बांटने वारे को लगे, ज्यों मेहंदी के रंग।'

वृक्ष कबहूँ नहीं फल भखैं, नदी न संचै नीर
परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर !

वृक्ष कभी अपने फल नहीं खाते, नदी जल को कभी अपने लिए संचित नहीं करती, उसी प्रकार सज्जन परोपकार के लिए देह धारण करते हैं !

कबीर दास जी ने लिखा..

स्वारथ सूखा लाकड़ा, छांह बिहूना सूल।
पीपल परमारथ भजो सुख सागर का मूल।।

स्वार्थ सूखी लकड़ी की तरह छाॅंह नहीं देती और राहगीर के कष्ट का कारण है। परमार्थी पीपल वृक्ष की भाॅंति अपने छाया से राहगीरों को सुख पहुॅंचाता है।

कबीर दास जी आगे लिखते हैं..

परमारथ हरि रुप है, करो सदा मन लाये
पर उपकारी जीव जो, सबसे मिलते धाये।

परमार्थ, दूसरों की सहायता करना ईश्वर का ही स्वरुप है।इसे सदा मनोयोग पूर्वक करना चाहिये। जो दूसरों का उपकार, मदद करता है वह उस प्रभु के समान है जो सबसे दौड़कर गले मिलते है।

सन्तों, कवियों ने परमार्थ को पहचान कर सभी को इस राह चलने की सलाह दी। मनुष्यों के हृदय में उपकार की भावना न हो तो संसार में सभी का जीना कठिन हो जाएगा। स्वार्थ जितना बढ़ेगा, जीवन उतना दुरूह होता जाएगा। यही कारण है कि आज के भौतिक युग में नाना प्रकार की विलासिता की वस्तुओं का उपभोग करने में समर्थ होते हुए भी लोग नाना प्रकार की व्याधियों से जकड़े, परेशान हाल घूमते पाये जाते हैं। निजी स्वार्थ में अंधे हो धन संग्रह करके तमाम सुख देने वाले साधनों को प्राप्त करने के बावजूद भी और..और की कामना में डूबे रहते हैं। 

ताल, तलैया पी कर जागा
नदी मिली, सागर भी मांगा
इतनी प्यास कहाँ से पाई
हिम से क्यों मरुथल तक भागा?
क्यों खुद को ही रोज छले रे!
तू है कौन? कौन हैं तेरे?

स्वार्थी मनुष्यों की भूख और प्यास तब तक समाप्त नहीं होती जब तक उनके भीतर दूसरों के उपकार की भावना नहीं जगती। परमारथ का भाव मन में न हो तो दूसरों का जीवन तो नर्क बनता ही है, स्वयं स्वार्थी को भी शांति नहीं मिलती। स्वार्थियों की इसी बेचैनी का फायदा ढोंगी बाबा उठाते हैं और भांति-भांति की भ्रांतियाँ फैलाकर लोगों को लूटने और अपना साम्राज्य खड़ा कर सुख भोगने में लगे रहते हैं। 
सुख उनको भी नहीं मिलता। जब पाप का घड़ा भर जाता है तो सब झूठ सामने आ जाता है। फर्जी बाबाओं का साम्राज्य ढहते और उन्हें जेल की हवा खाते देखने के बाद भी जिनकी आँखें नहीं खुलतीं उनका तो ईश्वर ही मालिक है

2.9.17

लोहे का घर-28

सुबह (दफ्तर जाते समय)

ट्रेन हवा से बातें कर रही है। इंजन के शोर से फरफरा के उड़ गए धान के खेत में बैठे हुए बकुले। एक काली चिड़िया उम्मीद से है। फुनगी पकड़ मजबूती से बैठी है। गाँव के किशोर, बच्चे सावन में भर आये गढ्ढे/पोखरों के किनारे बंसी डाल मछली मार रहे हैं। क्या बारिश के साथ झरती हैं आकाश से मछलियाँ ?

आज बारिश हुई है। घर से निकलते वक्त यही बारिश खराब लग रही थी, #लोहेकेघर में बैठ बाहर खिड़कियों से झांकते समय मौसम सुहाना लग रहा है। मौसम व्यक्ति की पोजिशन के हिसाब से अच्छा/बुरा होता है। मौसम बदलने के चक्कर में न पड़, पोजिशन बदलने का प्रयास करना चाहिए।

उमड़-घुमड़ बादलों से घिर-घिर, आ रही है बदली। एक टाली वाला खेत के किनारे बनी सड़क पर बोझा लादे टाली खींच रहा है। #रेल पटरी पर जमी घास उखाड़ रहे हैं मजदूर। पता नहीं इनके लिए मौसम कितना सुहाना है!

शाम(घर लौटते समय)

धान कुछ बड़े हो चुके हैं। कास फूल चुके हैं। वर्षा ऋतु बीत रही है। गोधूली बेला है। दिन ढलने वाला है। लोहे के घर की बत्तियाँ जल चुकी हैं। खेत अभी दिख रहे हैं। कहीं-कहीं सुनहरे हैं आकाश में छिटके बादल। बाहर सन्नाटा पसरा है, भीतर शोर है। तनिक और गहरे उतरिये तो बाहर शोर है और भीतर सन्नाटा। मन बेचैन है दृष्टा बनी हैं जिस्म की सभी इन्द्रियाँ।

मस्त है, इंजन के सहारे पटरी पर चलती गाड़ी। निश्चिंत हैं यात्री। यात्री के पास समय ही समय है। देश की चिंता करने के लिए फुरसत के ये लम्हें बड़े काम के हैं। आदमी फालतू न हो तो अपनी भी चिन्ता नहीं कर पाता, देश की क्या करेगा!

वे एक बड़े आदमी थे। शाम के समय अक्सर अपने साथियों के साथ देश की चिंता में डूब जाते। इधर मैं मैं करता अहंकार में डूबा बकरा कटता, कलगी उठाये घूम रहे मुर्गे स्वर्ग जाते, खौलते कड़ाहे में मछलियाँ तैरतीं उधर भुने काजू के साथ शराब के दौर पर दौर चलते। वे और उनके साथी तब तक देश की चिंता करते रहते जब तक कारिंदे आ कर कह नहीं देते..साहेब! खाना तैयार है।

लोहे के घर में आम आदमी देश की चिंता करते-करते बहसियाने और झगड़ने लगते हैं। न काजू मिलती है, न शराब। सभी फोकट में अपने-अपने बड़े आदमियों के लिए आपस में झगड़ते हैं। बड़े आदमी खाना खाने के बाद लेटे-लेटे टीवी में देख लेते हैं आम आदमियों को भी। बाढ़ से परेशान लोगों को देख कोई कहता है..यार! कोई बढ़िया वाला चैनल लगाओ, ये तो हर साल मरते हैं!

हलचल बढ़ रही है लोहे के घर में। आने वाला है कोई बड़ा वाला स्टेशन जहाँ अधिक लोगों को उतरना है। फुरसत के लम्हें खत्म हुआ चाहते हैं। देश की चिंता छोड़ अपनी चिंता करने का समय नजदीक आ चला है।

प्रकृति (सब गम भुलाकर जीना सिखाती है)

बारिश से पहले
तेज हवा चली थी
झरे थे
कदम्ब के पात
छोटे-छोटे फल
दुबक कर छुप गये थे
फर-फर-फर-फर
उड़ रहे परिंदे
तभी
उमड़-घुमड़ आये
बदरी-बदरा
झम-झम बरसे
बादल
सुहाना हो गया
मौसम
बारिश के बाद
सहमे से खड़े थे
सभी पेड़-पौधे
कोई बात ही नहीं कर रहा था
किसी से!
सबसे पहले
बुलबुल चहकी
कोयल ने छेड़ी लम्बी तान
चीखने लगे
मोर
कौए ने करी
काँव-काँव
और...
बिछुड़े
साथियों को भुलाकर
हौले-हौले
हँसने लगीं
पत्तियाँ।

22.8.17

भागे रे! #हवा खराब हौ!!!

कर्फ्यू वाले दिनों में बनारस की गलियाँ आबाद, गंगा के घाट गुलजार हो जाते । इधर कर्फ्यू लगने की घोषणा हुई, उधर बच्चे बूढ़े सभी अपने-अपने घरों से निकल कर गली के चबूतरे पर हवा का रुख भांपने के लिए इकठ्ठे हो जाते। बुजुर्ग लड़कों को धमकाते..अरे! आगे मत जाये!!
बनारस की गलियों में लड़कों को गली में निकलने से कौन रोक सकता था भला! घर के दरवाजे पर बाबूजी खड़े हों तो बंदरों की तरह छत डाक कर पड़ोसी के दरवाजे से निकल जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। लड़के गली के उस मोड़ तक पहुंच जाते जहाँ सड़क शुरू होती और पुलिस का पहरा चकाचक होता। जब पुलिस गली में लड़कों को दौड़ाती तो लड़के भाग खड़े होते। भागते हुए कोई दिख जाता तो जोर से चीखतेे...भाग @सड़ी के! हवा खराब हौ!!! मुसीबत के समय ही यह ज्ञान होता है कि हवा भी खराब होती है!
मास्टर साहब से पूछा..गुरुजी! हवा बहती है कि बहता है? गुरुजी भोजपुरी बेल्ट के थे, हँस कर बोले..हवा न बहती है न बहता है, हवा त बहेला! मुझे लगा वाकई हवा बड़ी खतरनाक चीज है। धीरे-धीरे ज्ञान हुआ हवा में ऑक्सीजन भी होता है, कार्बन भी। जहरीली भी होती है, प्राणदायी भी। एक कविता पढ़ी थी अपने पाठ्यपुस्तक में जिसमें हवा सूरज से भिड़ जाती है और एक राह चलते पथिक की शामत आ जाती है। यह कवि की निच्छल भावना थी। हर आदमी कवि नहीं होता और हर आदमी साधारण पथिक भी नहीं होता जिसे धूप और हवा अपनी उँगलियों पर नचाती हैं। धरती में ऐसे भी आदमी हैं जो धूप और हवा दोनो को अपनी मुट्ठी में कैद कर लेते हैं!
दूसरों की हवा खराब करना और अपनी बनाना राजनीति का मूल मंत्र है। राजनीतिज्ञ से बड़ा कोई देशभक्त नहीं होता क्योंकि देशभक्ति से बड़ी कोई राजनीति नहीं होती। हवा बनाने से बनती है, बिगाड़ने से बिगड़ती है। विपक्ष प्रायः सरकार के हर निर्णय में कमी ढूँढ लेता है और सरकार अपने हर निर्णय को सही ठहराती है। सरकार का हर निर्णय सही और विपक्ष की हर आलोचना राजनीति से प्रेरित मानी जाती है। हवा का रुख भांप कर निर्णय इस प्रकार से लेना कि भले देश का आर्थिक नुकसान हो, उसके वोटर प्रसन्न रहें तो ऐसे निर्णय को राजनैतिक हवाबाजी कहते हैं।
दूसरों की हवा खराब करने और अपनी बनाने का खेल छोटे स्तर से अंतर्राष्टीय मंच तक चलता रहता है। विपक्ष की हवा खराब कर सत्ता हासिल करने के बाद राष्ट्राध्यक्ष की कोशिश होती है कि अंतर्राष्टीय स्तर पर दुश्मन देश की हवा खराब की जाये और मित्र देश की हवा बनाई जाये।
इस वक्त भारत में विपक्ष की और अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की हवा खराब है। तीन तलाक के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला आने के बाद देश के महिलाओं के पक्ष में हवा बन गई है। अमेरिकी  राष्ट्रपति की ताजा विदेश नीति के कारण तो पाकिस्तान की हवा गुम हो गई लगती है। चीन हवा का रुख मोड़ना चाहता है। यही हाल रहा तो एक दिन आतंकवादी भागते हुए चिल्लाते मिलेंगे...भागे रे! हवा खराब हौ।