20.1.18

लोकतंत्र का बसंत

काशी में मराठी भाषा का एक कथन मुहावरे की तरह प्रयोग होता रहा है.. "काशी मधे दोन पण्डित, मी अन माझा भाऊ! अनखिन सगड़े शूंठया मांसह।" जजमान को लुभाने के लिए कोई पण्डित कहता है.. काशी में दो ही पण्डित हैं, एक हम और दूसरा हमारा भाई। बाकी सभी मूर्ख मानव हैं। ऐसे ही हमारे देश के लोकतंत्र में भी दो संत पाए जाते हैं। एक अ संत दूसरा ब संत। बाकी रही विद्वान जनता जिनकी गलतियों के कारण ही दोनों संत निरंतर मोटाते रहते हैं। इसे यूं समझा जाय कि लोकतंत्र एक बड़ा सा घर है जिसमें अ संत और ब संत दो भाई रहते हैं। जहां असंत है, वहीं बसंत है। जनता जजमान की तरह कभी इनसे छली जाती है कभी उनसे।

जनता अपना काम लेकर कभी अ संत के पास जाती है कभी ब संत के पास। अ संत के पास जाने वाली जनता समझती है कि अ संत ही उसके घर में बसंत ला सकता है। ब संत के पास जाने वाली जनता समझती है कि अ संत तो इसका भाई ही है, वह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा ब संत ने चाहा तो मेरे घर भी बसंत आ ही जाएगा।

भारत का लोकतंत्र एक बहुत बड़ा घर है। इसके चार बड़े बड़े खंबे हैं। ये खंबे इतने मजबूत हैं कि अ संत और ब संत के हरदम बसंत मनाने के बावजूद भी ज्यों का त्यों मजबूत बना हुए हैं। कभी कोई खंबा अ संत की कारगुज़ारियों से कराहता है, कभी कोई खंबा ब संत की कारगुज़ारियों से लेकिन मुश्किल वक़्त में बाकियों के सहारे चारों खंबे मजबूती से लोकतंत्र को टिकाए रखते हैं।

पहले हमारे देश में बहुत से संत रहते थे। कोई अ संत और ब संत नहीं था। भारत का लोकतंत्र उन्हीं संतों की तपस्या का परिणाम है। अब इसमें संत के बेटों अ संत और ब संत का राज चलता है। बारी बारी से दोनों बसंत मनाते हैं और जनता कभी इनकी जय जयकार करती है, कभी उनकी।

प्रकृति का बसंत हर साल आता है। वीरों का बसंत तब आता है जब उन्हें युद्ध के मैदान में जौहर दिखाने का अवसर मिलता है। विद्यार्थी तब बसंत मनाते हैं जब परीक्षा में पास होते हैं। लेखकों का बसंत उनकी नई पुस्तक के लोकार्पण के दिन होता है। लेकिन भारतीय लोकतंत्र का बसंत पॉच साल में एक बार आता है जब देश में चुनाव होते हैं। प्रकृति का बसंत तो पतझड़ के बाद आता है मगर लोकतंत्र में पतझड़ और बसंत दोनो साथ साथ आते हैं। जो पार्टी हारती है उसके पतझड़ के दिन शुरू हो जाते हैं, जो जीत जाती है उनके पत्ते लहलहाने लगते हैं। इस प्रक्रिया को संत और असंत दोनों लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत मानते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिस देश में चुनाव ही नहीं होते उस देश का राजा तानाशाह हो सकता है लेकिन लोकतंत्र में भी हारने वाला, शासक दल को तानाशाह घोषित करवाने में लगा रहता है। लोकतंत्र के चारों खंबों पर बारी बारी से पोस्टर चस्पा किए जाते हैं.. लोकतंत्र खतरे में है!

भारत का लोकतंत्र जितना ताकतवर माना जाता है उतना ही कमजोर भी होता है। जरा सी कुछ बात हुई कि खतरे में पड़ जाता है। लोकतंत्र न हुआ भारतीयों का कमजोर अंग हो गया जो हर बात पर फटने लगता है! लोकतंत्र के खतरे में पड़ने का ज्ञान विपक्ष को ही होता है। सत्ता पक्ष तो हमेशा सुदृढ़ लोकतंत्र का ढिंढोरा ही पीटता पाया जाता है। सत्ता पक्ष लोकतंत्र का बसंतोत्सव मनाता है तो विपक्ष लोकतंत्र के पतझड़ की तरह झड़ता रहता है। लोकतंत्र के चारों खंबे जब जब अपना दुखड़ा रोते हैं, विपक्ष तपाक से उनके सुर में सुर मिलाते हुए जनता को भड़काता फिरता है.. लोकतंत्र खतरे में है! विपक्ष की आदत दूसरे के फटे में टांग अड़ाने की है और सत्ता पक्ष सूई धागा लेकर आम जनता के फटे को सीने के लिए दौड़ता भागता दिखने की कोशिश करता है।

विपक्ष का मजबूत होना अच्छे लोकतंत्र की निशानी माना जाता है। अभी भारत में विपक्ष कमजोर है शायद इसीलिए लोकतंत्र बार बार खतरे में पड़ रहा है। विपक्ष तगड़ा हुआ तो सत्ता कमजोर पड़ने लगती है। चुनाव के समय अपने दम पर सरकार बना लेने का दावा करने वाली पार्टियां गणित कमजोर पड़ने पर विपक्षी पार्टियों को तोड़ती मेल जोल करती दिखने लगती है। सरकार बनने के बाद शेष बची हुई पार्टियां विपक्ष में आ जाती हैं और आपस में मिलकर तगड़ा विपक्ष बनने का प्रयास करती हैं। बड़े दंभ से कहती हैं.. आपस में मेल जोल न होई त चली का?

आम आदमी जिसकी पहुंच रोटी, कपड़ा और मकान के आगे सुबह के अखबार/शाम के टीवी तक है वे तो 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के दिन ही लोकतंत्र का बसंतोत्सव मना कर खुश हो लेते हैं। हम भी न अ संत हैं न ब संत। थोड़ा लिखना पढ़ना जान गए हैं। लोकतंत्र के बसंतोत्सव से दो चार फ़ूल मिल गए इसी में खुश हैं। हम भी बस यही मंगल कामना कर सकते हैं कि हमारे महान संतों की घनघोर तपस्या से जो यह लोकतंत्र की बगिया खिली है इसमें से एकाध फूल उन अभागों को भी मिले जिन्हे आजतक पतझड़ और कांटों के सिवा कुछ भी नसीब नहीं हुआ।

14.1.18

पुस्तक मेला और साहित्यकार

एक बार बलिया के पशु मेले में गए थे, एक बार दिल्ली के पुस्तक मेले में। दोनों मेले में बहुत भीड़ आई थी। जैसे पशु मेले में लोग पशु खरीदने कम, देखने अधिक आए थे वैसे ही पुस्तक मेले में भी लोग पुस्तक खरीदने कम, देखने अधिक आए थे। दर्शकों के अलावा दोनों जगह मालिकों की भीड़ थी। कहीं पशु मालिक कहीं पुस्तक मालिक। जैसे पुस्तकों के मालिक केवल लेखक नहीं, प्रकाशक भी होते हैं वैसे ही पशुओं के मालिक भी अपने अपने पशुओं को एक स्थान पर सुपुर्द किए दे रहे जो उन्हें सजा कर बेच रहा था। जैसे पशु मेले में अपना कोई पशु नहीं था वैसे ही पुस्तक मेले में भी अपनी लिखी कोई पुस्तक नहीं थी। दोनो मेले में एक ही प्रश्न देर तक मेरा पीछा करते रहे..आपकी कहां है?

आदमी अपने अनुभवों से ही कुछ सीखता है। यदि आपका थोपड़ा पशु मालिक या लेखक की तरह हो तो आप को दोनो ही मेले में नहीं जाना चाहिए। पशु मेले में जाएं तो आपके हाथ में लंबा पगहा हो और पीछे कोई दुधारू गाय लचक लचक कर चल रही हो। बिना पशु वाले किसान की पशु मेले में और बिना पुस्तक वाले लेखक की पुस्तक मेले में कोई इज्जत नहीं होती। पुस्तक मेले में तब तक न जाएं जब तक आपकी कोई पुस्तक प्रकाशित न हो चुकी हो। बिना अपनी पुस्तक लिए गए तो फिर आप दुकान-दुकान घूम कर पुस्तक खरीदते ही रह जाओगे, बेचने का सुख नहीं मिलेगा।

ईश्वर जानता है कि जो सुख ज्ञान देने में है वह लेने में कत्तई नहीं है। जेब खाली कर ज्ञान वही खरीद सकता है जिसका पेट भरा हुआ हो और घर में खजाना गड़ा हुआ हो। ज्ञान तो धीरे से चुरा लेने की चीज है। लाइब्रेरी में गए और नोट बना लिए। एक पुस्तक इशू कराए दूसरी दबा कर निकल लिए। पढ़ने लिखने वाले चेहरे से शरीफ दिखते हैं इसलिए इनकी चोरी कम पकड़ में आ पाती है। धरा भी गए तो पकड़ने वाले भी पढ़ने लिखने वाले होते हैं, जल्दी से माफी मिल जाती है। अब एक मल्लाह, दूसरे मल्लाह से क्या पार उतरवाई लेगा? लेखक बिरादरी राजनेताओं की तरह कृतघ्न थोड़ी न होती है कि मौका पाते ही विरोधियों के पीछे सी.बी.आई छोड़ दे! लेखक की चोरी पकड़ी भी गई तो भले उपेक्षा का शिकार हो जाय, सजा नहीं पाता।

पुस्तक मेले में घूमने आए लोग सभी स्टाल में जाकर सभी प्रकार की पुस्तकें ऐसे पलटते हैं जैसे सत्य की खोज में निकला फकीर ज्ञान तलाशने के लिए जंगल जंगल भटक रहा हो ! अंत में खरीदते वही दो चार पुस्तकें हैं जिनके लेखकों के नाम अपने पाठ्य पुस्तक से उन्होंने सुन रखे हैं। सब पलटने के बाद मासूमियत से पूछते हैं.. मुंशी प्रेम चंद की गबन है? दुकानदार भी आदतन उस कोने की तरफ इशारा करता है जिधर उसकी टाइप के लोग अधिक आये हैं और जहाँ अधिक भीड़ है। इस प्रश्न पर दुकानदार अधिक झल्लाते पाए जाते हैं.. दो बैलों की जोड़ी है? गनीमत है यह नहीं कहते..दो बैलों की जोड़ी लेनी हो तो पशु मेले में जाओ, यहां क्यों घूम रहे हो?

पहले लेखक बनने और एक पुस्तक छपवाने के लिए भूखे पेट रहकर किसी बड़े साहित्यकार के दरबार में वर्षों खुद को तपाना और लेखक सिद्ध करना पड़ता था। प्रतिष्ठित साहित्यकार का आशीर्वाद मिलने के बाद ही कोई प्रकाशक किसी नए लेखक की कोई पुस्तक छापने की हिम्मत जुटा पाता था। अंतर्जाल के प्रचलन और आभासी दुनियां ने इस पूरे पटल को ही बदल कर रख दिया है। सभी की डायरियां अब ब्लॉग/फेसबुक में लिखी जाने लगी हैं। जेब में पैसा हो, प्रशंसक हों तो आप सीधे प्रकाशक से बात कर सकते हैं.. कित्ता लोगे? और कित्ती दोगे? पुस्तक न बिकनी है न रायल्टी मिलनी है. यह बात आप भी जानते हैं, प्रकाशक भी। एकमुश्त सौदा तय हो जाता है। इत्ती लेंगे और प्रकाशन के बाद इत्ती पुस्तकें देंगे। आपको लेखक बन ख्याति अर्जित करनी है, अगले को प्रकाशक बन पैसा कमाना है। ख्याति और पैसे के इसी सुखद संजोग ने पाठक शून्यता के हाहाकारी जुग में भी चमत्कारिक ढ़ंग से नए लेखकों और प्रकाशकों की नई पौध का सृजन किया है। पुस्तक मेला और कुछ नहीं छुट्टे शब्दों की भीड़ है जो पशुओं की तरह अपने अपने मालिकों के साथ पुस्तक रूपी पगहे में बंधी कुछ पाने की लालसा लिए एक स्थान पर जमा होती है। इस भीड़ में कोई निराला, कोई धूमिल कोई गालिब अपने झोले में अपनी पांडुलिपी दबाए भूखे पेट, प्रकाशक-प्रकाशक घूम रहा हो तो भला उसे कौन पहचानेगा? यह दौर लेखक बन कर नाम कमाने का है तो यह दौर अच्छे लेखकों के बिना प्रकाशित हुए गुम हो जाने का भी है।

7.1.18

लोहे का घर-35

लोहे के घर में तास खेलने वालों की मंडली में एक सदस्य कम था और तीन साथियों ने मुझे खेल से जोड़ लिया। उधर कलकत्ता जा रहे बंगाली परिवार के बच्चों का झुंड शोर मचा रहा था, इधर मेरे बगल में बैठकर कनाडा से भारत दर्शन के लिए आईं एक गोरी मेम पुस्तक पढ़ रही थीं। मेरा ध्यान कभी बच्चों पर, कभी बगल में बैठी गोरी मेम पर और कभी उसके हाथ की पुस्तक पर जा रहा था। जाहिर है खेल में ध्यान न होने के कारण हम हारे जा रहे थे। यह दून एक्सप्रेस थी।

पार्टनर चीख रहा था..का गुरु ई का चलला?
मैं गोरी से बात कर रहा था... यू केम फ्रॉम देहरादून?
महिला भी मुस्कुरा कर जवाब दे रही थीं.. नो फ्रॉम हरिद्वार।
पार्टनर फिर चीखा..हार गइला! ला, फेंटा।

मैं तास फेंटते हुए महिला को टूटी फूटी अंग्रेजी में खेल के बारे में समझा रहा था.. दिस इज दहला पकड़! दहला मिंस टेन। देयर इज फ़ोर टेंस इन कार्ड। हू कैच मोर देन टू, दे विंस।

गोरी ऐसे चमक के ओ येस! हूं..कर रही थी जैसे सब समझ गई हो। फिर उसने कुछ फ्रेंच नाम गिनाए तास के खेल के। मुझे वे नाम ऊटपटांग लगे। मैंने मुस्कुरा कर कहा..नो नो आई डोंट नो। मैं सोच रहा था कि समीर भाई साहब को फोन लगा कर पूछूं कि क्या कनाडा में फ्रेंच बोली जाती है? या यह महिला फ्रांस से आई है? फिर उसकी पुस्तक के बारे में जानना चाहा। उसने पुस्तक दिखाई। वह एक फ्रेंच भाषा में लिखी महात्मा गांधी जी के दक्षिणी अफ्रीका के संघर्ष के बारे में पहला गिरमिटिया टाइप कोई पुस्तक थी। शायद महिला भारत भ्रमण के दौरान गांधी जी को पढ़कर भारत के बारे में जानने का प्रयास कर रही थी।

हम दूसरा गेम भी हार गए। मेरा पार्टनर मुंह बना रहा था और विरोधी मस्त हो रहे थे।

अकेली महिला बनारस जा रही थी, जहां उसके मित्र उसका इंतज़ार कर रहे थे। मैंने महिला को बनारस के घाटों, सारनाथ के बारे में जानकारी दी और सूर्योदय के समय नाव में घूमने की सलाह भी दी। वह मेरी बात समझ भी रही थी या खाली-पीली मुस्कुरा कर हां हूं कर रही थी यह तो वही जाने लेकिन हम लगातार हारे जा रहे थे। जब अपने ऊपर कोट चढ़ता तो हम प्रसन्न होते कि चलो अब पार्टनर पीसेगा और हमें केवल पत्ते फेंकने पड़ेंगे!

यह बहुत देर नहीं चलना था और नहीं चला। खेल बन्द हुआ और हमने महिला को पुस्तक पढ़ने की सलाह देते हुए अपनी मोबाइल निकाल ही ली। जैसे ही बनारस का आउटर आया कौन, मित्र कौन गोरी! ट्रेन को कोमा में छोड़ हमने घर जाने के लिए ११ नंबर की बस पकड़ ली।

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जाड़े में अदरक का क्रेज भांप कर लोहे के घर में वेंडर आवाज लगाते हैं..चाय बोलिए चाय, अदरक वाली चाय। पता नहीं कैसी होती है लेकिन एक बात तो पक्की है कि दूध, चायपत्ती चाहे जैसी हो, अदरक जरूर होती होगी चाय में।

अपनी फोट्टी की प्रतीक्षा में कोहरे में डूबे कैंट प्लेटफार्म पर खड़े खड़े कुछ मजेदार एनाउंसमेंट सुनाई पड़ रहे थे। फिफ्टी डाउन के प्लेटफॉर्म नंबर ६ पर आने का संकेत हो चुका है, यात्री गण ध्यान दें यह गाड़ी १ जनवरी की है! अब एक बार यह गाड़ी १ जनवरी की बताने के बाद टेप चालू हो गया। फिफ्टी डाउन के आने का संकेत हो चुका है, यह गाड़ी प्लेटफॉर्म नंबर....। अब १ जनवरी नहीं बोल रहा। जिसने सुना उसका भला, जिसने नहीं सुना, उसकी किस्मत। ट्रेन में दोनों नंबर लिखे होते हैं। २०४९ के समय २०५० आ जाए तो हड़बड़ी में लोग बिना इंजन देखे एक के बदले दूसरे में बैठे भी पाए जाते हैं। ऐसे लेट लतीफी के मौसम में एक एनाउंसमेंट यह भी होना चाहिए कि यात्री दिशा का ज्ञान रखें कि उन्हें किधर जाना है और इंजन का रुख किस ओर है! ऐसी एक दो ट्रेनें और आईं जो १ जनवरी की थी। शुक्र है कोई पिछले साल की नहीं थी। हमने यह नहीं सुना कि यह गाड़ी पिछले साल की है।

खैर अपनी फोट्टी आई, सभी यात्री उतर गए, सभी रोज के यात्री इत्मीनान से बैठ गए तब ध्यान आया कि एक भारी सूटकेस तो नीचे पड़ा हुआ है! शोर हुआ..यह किसका है? कौन इतना बड़ा बैग लेकर जौनपुर जा रहा है? पता चला किसी का नहीं है! हम में से एक दौड़ कर बाहर गया और चिल्ला कर पूछने लगा..किसी का बैग छूटा है? ट्रेन छूटने वाली थी तभी एक यात्री भागा भागा आया….मेरा एक सूटकेस छूटा है। सूटकेस उतार कर उसने इतनी बार थैंक्यू बोला कि क्या कहा जाय! अपनी आत्मा भी संतुष्ट हुई।

पटरी पर चल रही है अपनी गाड़ी और दिख रहे हैं कोहरे मे डूबे सरसों के खेत। कथरी ओढ़ कर बैठी एक काली गाय आराम आराम से मुंह चला रही दिखी थी अभी। लोहे के घर में बैठे यात्री भी मुंह चला रहे हैं लेकिन ये बतिया रहे हैं वो खाना पचा रही थी। कड़ाकी ठंड में खिड़की खोल कर फोटू खींचना संभव नहीं है। हम इच्छा भी करें तो दूसरे चीखने लगते हैं... तोहें फोटू खींचे के होय त दरवज्जे पे चल जा! नहीं त बइठ जा लोहे के घर के छत पर!!!

जलालपुर का पुल थरथराया है। कोहरे की चादर ओढ़ इत्मीनान से सोई है सई नदी।
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ठंड के थपेड़े कह रहे हैं..आज तो मैं और मैं ही हूं। स्टेशन के बाहर कुछ लोग सूखी लकड़ियां जलाने का प्रयास कर रहे थे। आग जली तो लपटें ऊपर तक उठने लगीं। आग देख भीड़ जुटने लगी। देखते ही देखते अच्छी खासी भीड़ आग के पास गोलाकार खड़ी हो गई। ऊपर आकाश में पीला चांद और नीचे आग की लपटें। ठंडी हवा दुम दबाकर भाग खड़ी हुई। जब तक #ट्रेन नहीं आ गई हम उसी भीड़ में खड़े कभी आग की लपटों को, कभी चांद को देखते रहे।
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स्टेशन के बाहर अलाव जलाने की व्यवस्था है। सूखी लकड़ियां गिरा कर चली जाती है नगर पालिका। पहले आग तापते हुए लोगों को देखकर लगता था..क्या फालतू वक़्त जाया कर रहे हैं लोग! लेकिन ट्रेन की प्रतीक्षा में आग प्राण दायिनी है। जैसे ही उठती हैं लपटें आग के इर्द गिर्द गोलाकार जमा हो जाती है भीड़। भीड़ में शामिल रहते हैं ट्रेन की प्रतीक्षा में प्लेटफार्म पर जमे यात्री, सवारी की प्रतीक्षा में खड़े ऑटो ड्राइवर, रिक्शे वाले और भी आस पास खाली बैठे गुमटी/ठेले वाले। खड़े खड़े लोग आपस में बतीयाते भी हैं।
कब तक जलती है आग?
पूरी रात!
रात में तो भीड़ नहीं होती होगी?
रात में तो और भीड़ रहती है। कोई प्लेटफार्म पर थोड़ी न बैठता है, सब यहीं जमा हो जाते हैं।

बीच बीच में अपने स्तर का हल्का फुल्का मजाक करते प्रसन्नता से आग तापते हैं सभी। किसी ट्रेन के आने का संकेत होता है, कुछ भीड़ छटती है। थोड़ी ही देर में नई ट्रेन का समय होता है, नई भीड़ जुड़ती है। मरुधर के आने का समय हुआ, हम भी चढ़ गए लोहे के घर में।
ख़ाली ख़ाली है इस ट्रेन की भी बोगियां। जोधपुर से चलकर बनारस जाने वाली ट्रेन है। पीछे से किसी यात्री के बड़बड़ाने की आवाज सुनाई पड़ रही है...१२ घंटे लेट हो गई! अब कर लो बात। इस कोहरे में पहुंच रहे हैं, यही क्या कम है? लेट न होती तो हम क्या करते? इन्हीं लेट ट्रेनों का ही तो सहारा है। शुक्र है भगवान का कि इस जाड़े में अपनी वाली के साथ सभी की लेट चलती है। घर से एक यात्री के भागवान का फोन आ रहा है। कितनी मासूमियत से दिलासा दे रहे हैं कि अब पहुंचने ही वाले हैं! ये सोच रहे हैं कि घर में इनकी चिंता हो रही है। जबकी रजाई में दुबकी महिला की चिंता यह होगी कि मुसीबत कब घर आने वाली है! खैर! जिस भाव से भी हो, चिंता तो है। शुभ शुभ, अच्छा अच्छा सोचना चाहिए। नकारात्मक सोच से तो सफ़र और भी दुश्वार लगने लगता है।
ट्रेन की रफ्तार धीमी है। आराम आराम से रुक रुक कर चल रही है। यात्रियों को चाहे जितनी जल्दी हो, अपनी पटरी नहीं छोड़ती ट्रेन। सिगनल और नियम कानून का पूरा ध्यान रखती है। जरा सी चूक हुई नहीं कि लोहे के घर से भगवान के घर जाने में देर नहीं होगी। बड़ा विशाल और बहुत कठिन लगता है रेलवे का परिचालन। बैठे बैठे हम चाहे जितनी आलोचना कर लें लेकिन इनकी समस्या और इनकी कठिनाइयां तो ये ही बेहतर समझ सकते हैं।
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लोहे के घर में एक गोल मटोल सुमुखी मोहतरमा फोन से बातें कर रही हैं। स्वेटर शाल से पूरा बदन ढका हुआ लेकिन मुखड़ा पूनम के चांद-सा खुला-खुला। बातों से पता चल रहा है कि यह अपने ससुराल जा रही हैं। खूब बातूनी लगती हैं। साथ में एक सहयोगी है। काम करने वाली लगती है जिसे यह बहन बता रही हैं। फोन में किसी को बता रही हैं...अम्मी खाना बनाकर टिफिन में दी है। सास दुष्ट है जो बार बार मायके भगा देती है। कहती है… अपने पति को भी लेकर जा, भाग यहां से!
तब आप फिर भी अकेली ससुराल जा रही हैं! डर नहीं लगता?
नहीं, अब तो कोर्ट से आदेश हो गया है ना। रहने के लिए घर में एक कमरा और दस हजार रुपया हर महीने देने का आदेश हो गया है। अब नहीं भगा सकतीं।
पति तो आप के साथ हैं न! फिर क्या चिंता?
नहींss अभी सास ने भड़का कर अपने साथ मिला लिया है ।
इतने गंभीर विषय पर साथ बैठे एक रोज के यात्री से खूब हंस-हंस कर बातें कर रही हैं!
अब कितने दिनों के लिए बनारस जा रही हैं?
अब अपने मर्जी के मालिक हो चुके हैं, जब चाहे जाओ/आओ। मेरी सास और खाला बहुत परेशान करती थीं। इसीलिए कोर्ट जाना पड़ा।
अब आप क्या चाहती हैं?
हर लड़की सुकून चाहती है। लड़ाई झगड़ा कोई नहीं चाहता। सास और खाला हर वक्त परेशान करती थीं और घर से भगा देती थीं।
मित्र को खूब मज़ा आ रहा है बातें करने में..
तीन तलाक पर आपकी क्या राय है?
अच्छा है। एक जगह से पास हुआ है, एक से नहीं। जब दोनों जगह से पास होगा तब न कानून बनेगा? पास हो जाएगा एक दिन। ऐसे खाविंद को सजा मिलनी ही चाहिए। आखिर लड़की घर मां/बाप छोड़ कर आती है। उसके साथ अन्याय नहीं होना चाहिए।
इतनी परेशानियों के बाद भी आप खूब स्वस्थ हैं!
मोहतरमा खुल कर हंसते हुए बोलीं...अरे! हम मोटी नहीं है। खून कम होने से शरीर फ़ूल गया है।
मुझसे रहा नहीं गया, बोल ही पड़ा..अरे! अापको मोटी किसने कहा?
हंसते और हाथ से इशारा करते हुए..भाई साहब ने। मैं खूब समझती हूं। जो भी मुझे देखता है मोटी समझता है लेकिन मैं मोटी नहीं हूं, खून कम होने से शरीर फ़ूल गया है। शादी से पहले खूब पतली दुबली थी। वैसे आप लोग कहां जा रहे?
मैं फिर बोल पड़ा...हम आपके ससुराल वाले हैं।
मोहतरमा हंसते हुए कहने लगीं...तब आप लोग हमारी किसी बात का बुरा मत मानिएगा। हमको बोलने की आदत है।
नहीं, नहीं बुरा क्या मानना! हम लोगों का आज का सफ़र आपकी बातों से ही कट गया।
शाम का समय, लोहे के घर की खिड़कियों से सुर सुर सुर सुर आती कटीली हवा और अजनबी महिला की रोचक बातें। इस महिला के कारण ससुराल वालों का जीना हराम है या ससुराल वालों ने इसका जीना हराम कर रखा है यह तो ऊपर वाला ही बेहतर जानता होगा मगर एक बात तो तय है कि लड़की को ससुराल में प्यार और सम्मान मिले तो वो बिला वजह मुसीबत क्यों मोल लेगी? सुख से रहना कौन नहीं चाहता? और अकेली महिला के लिए पहले तो गुजारा भत्ता की लड़ाई जीतना कठिन है फिर जीतने के बाद गुजारा भत्ता और उसी घर में एक कमरा लेकर रह पाना हैरतअंगेज करने वाला साहस है। यह सबके वश की बात तो नहीं लगती।
पुराने सामाजिक गठबंधन तेजी से टूटते प्रतीत हो रहे हैैं। कोई किसी की अधीनता स्वीकार करना नहीं चाहता मगर दोनों एक दूसरे को गुलाम बनाए रखना भी चाहते हैं। अब नारी किसी हालत में पराधीनता स्वीकार नहीं करना चाहती, अब पुरुष भी सहमा-सहमा सा दिखता है।
ये वैवाहिक संबंध एक ऐसी अबूझ पहेली है जिसे समझ लेने का दावा हर कोई करता दिखता है मगर समझ कोई नहीं पाता। इसमें कोई एक फार्मूला लागू ही नहीं हो सकता। हर जोड़े के अपने अपने नगमें, अपने अपने पेंच - ओ - खम हैं। कभी- कभी तो शतरंज के खेल से प्रतीत होते हैं वैवाहिक संबंध! जिसमें खेल तो शतरंज का ही चल रहा होता है मगर हर खेल दूसरे से जुदा, हर चाल नई होती है। जैसे शुरुआती चालों के बाद दो खेल कभी एक से नहीं खेले गए वैसे ही सुहागरात तो सबने मनाए लेकिन लिखने वाले ने सभी की कहानियां अलग-अलग लिख दीं! 

24.12.17

लोहे का घर-34

देर सबेर प्लेटफार्म पर ट्रेन आ गई तो ट्रेन को देखते ही रोज के यात्रियों की पहली समस्या होती है कि किस बोगी में चढ़ें? 60 किमी की दूरी के लिए बर्थ रिजर्व तो होता नहीं। लगभग सभी ए सी क्लास के यात्री होते हैं जो जनरल की भीड़ में रोज चल सकते नहीं। रोज के यात्रियों के लिए रेलवे ने एम.एस. टी. की सुविधा प्रदान कर रखी है लेकिन नियमानुसार इन्हें ए. सी. क्या स्लीपर में बैठने की भी इजाजत नहीं होती। अब दूरी इतनी कम होती है कि स्लीपर में तो टी. टी. इग्नोर कर देते हैं लेकिन ए सी बोगी न खाली होती है न टी. टी. अनुमती ही देते हैं। रेलवे रोज के यात्रियों के लिए ऐसी कोच लगाए तो कहां तक लगाए? सुबह शाम के बाद बाकी समय इन बोगियों पर कौन बैठेगा? हां चाहे तो छोटी दूरी के यात्रियों के लिए एक ए सी/ स्लीपर चेयर कार लगा सकती है जिसमें एम एस टी बनाने का या यात्रा का किराया अधिक हो। यह भी हो सकता है कि 60 किमी के लिए एक इंटर सिटी एक्सप्रेस ट्रेन चले जो सुबह शाम आती जाती रहे। जौनपुर बनारस रूट पर तो इतने यात्री होते हैं कि हर घंटे ट्रेन पूरी तरह भर जाय। लगता है इस समस्या पर रेलवे का ध्यान कभी गया ही नहीं। यह होता तो रोज के यात्रियों को बेवजह की जलालत और रिजर्व क्लास को कभी कोई असुविधा न होती। अब रोज के यात्रियों की मजबूरी होती है कि स्लीपर में ही चढ़ें।

प्रायः सुबह कैंट बनारस आने वाली फ़ोट्टी नाइन अप ट्रेन बनारस में खाली हो जाती है और सभी को पर्याप्त स्थान मिल जाता है। लेकिन अब बोगी में चढ़ने के बाद दूसरी समस्या.. कहां बैठें? यात्री अधिक हैं और सभी के अपने अपने छोटे छोटे ग्रुप हैं। कोई बैठते ही तास खेलना चाहता है तो कोई देश की चिंता करते हुए ताजा खबर पर बहस करना चाहता है। टी वी में राजनैतिक बहस देखते देखते लोग इस राजनैतिक बहस के आदी हो चुके प्रतीत होते हैं। कोई बैठे बैठे ऊंघना/सोना चाहता है तो कोई ऊपर खाली बर्थ देखकर सोने के लिए लपकता है। कई यात्री ऐसे भी हैं जो इसी समय में दफ्तर के अधूरे काम पूरा कर लेना चाहते हैं। कोई मोबाइल में कल रात देखी अधूरी फिल्म पूरी कर लेना चाहते हैं। कोई इत्मीनान से अखबार के अक्षर अक्षर पी जाना चाहते हैं तो कोई वाट्स एप/ फेसबुक में अपना स्टेटस अपडेट करते पाए जाते हैं। जितने यात्री उतने मिजाज के! कोई एक गोल का यात्री दूसरे में बैठना नहीं चाहता। पूरी बोगी खाली मिले तो भी यह समस्या होती है कि कहां बैठें? हम तो बच्चों की तरह खिड़की वाली सीट पर बैठना पसंद करते हैं ताकि मौका मिलते ही एकाध तस्वीर खींच ली जाय।

लोहे के घर में बैठने के स्थान का चुनाव भी वैसे ही करना पड़ता है जैसे घर में हम कमरा या कमरे का एक कोना चुनते हैं। मन माफिक जगह मिल गई, साथी मिल गए तो सफ़र कब कटा पता ही नहीं चलता। यही भीड़ भाड़ वाली ट्रेन में मज़बूरी में एक कोना पकड़ कर बैठना पड़ा तो चेहरा देखने लायक होता है। शाम के समय अक्सर भीड़ भाड़ वाली ट्रेन मिलती है जिसमें कोई च्वाइस नहीं होता। जहां जगह मिल गई बैठ गए। धन्य भाग जो आसन पायो! वाला भाव रहता है।

अभी शाम का समय है। देहरा से आने वाली लेट #दून मेरे समय पर मिल गई। आया था#मरुधर पकड़ने प्लेटफार्म पर दून खड़ी हारन बजाती मिली! मानो कह रही हो.. बैठना हो तो बैठो वरना मैं तो चली। इसके चलते ही मैं भी तपाक से चढ़ गया। बहुत भीड़ है हर बोगी में। कलकत्ता जाने वाले बंगाली यात्री भरे पड़े हैं। पूरे घर में बंगाली ही सुनाई पड़ रही है। मेरे सामने बैठे एक रोज के यात्री Rajiv Singh जी मुझे लिखता देख बोर हो चुके हैं। आपको पढ़ कर बोर होने के लिए धन्यवाद।

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जाड़े की शाम जल्दी ढल जाती है। लोहे के घर में सूर्यास्त देखने नहीं मिलता। आमने सामने बर्थ पर दो महिलाएं, दो बच्चे हैं। अभी जफराबाद से #ट्रेन चली है। दो चार रोज के यात्री और आ गए इस बोगी में। बंगाली परिवार है। बच्चे शैतानी और महिलाएं खूब शोर कर रही हैं। इतनी जल्दी-जल्दी, तेज-तेज बोल रही हैं कि कुछ समझ में नहीं आ रहा। देहरादून घूम कर अब जा रही हैं बनारस घूमने। घर कलकत्ता में है। हरा मटर देख कर बच्चे ललचिया गए और दस दस टका के दो दोने खरीद ही लिए इन्होंने। मेरा मन कर रहा था कि हरे मटर की खामियां बताकर मना कर दूं लेकिन चुप ही रहा। सभी मटर खाते हुए न जाने किस बात पर लगातार हंसे जा रहे हैं!

दोनों महिलाओं ने एक बच्चे को पूरी तरह नंगा कर दिया है! बच्चे को पॉटी करना है। इस जाड़े में भी रेल के सफ़र में छोटे बच्चे के स्वेटर, शर्ट उतार कर पॉटी कराना कुछ पल्ले नहीं पड़ा। मन में कई प्रश्न उठ रहे हैैं। ऐसा क्या धार्मिक होना कि बच्चे को नंगा कर टॉयलेट भेजा जाय! ठंड लग गई तो?

मैंने पूछा..यह क्या जरूरी था?
एक महिला ने उत्तर दिया..हम लोग ऐसे ही जाता!
बड़ा हुआ तो?
गमछा पहन कर जाता। घर में पूजा होता है न! इसीलिए।
आप लोग ब्राह्मण हैं?
हां।
यह तो रेल है, यात्रा के समय इतना क्या धार्मिक रहना!
हम लोग मानते हैं, ऐसे ही चलता है।

अब हमें अपना बचपन याद आया। अपने घर में भी जब तक पिताजी थे यही हाल था। टॉयलेट जाना हो तो एक बनारसी लाल अंगोछा पहन कर जाना पड़ता था। बाहर निकल कर नहाना पड़ता था। भोजन के लिए पीढ़ा और शोला जरूरी होता। वे अपने बचपन के दिन थे। अब नदी में बहुत पानी बह गया। नहाना तो आज भी रोज होता है लेकिन ऐसी कोई पाबन्दी नहीं। सफ़र में तो बिल्कुल भी नहीं। मैं तो भूल ही चुका था इस परंपरा को। न बच्चों पर प्रतिबन्ध लगाया न होश संभालने पर खुद माना। आज इस ब्राह्मण बंगाली परिवार के एक बच्चे को नंगा हो कर पॉटी करने जाते देख याद आया। रूढीवादी परंपराएं संस्कृति का हिस्सा बन जाती हैं। कितने परिवारों ने इसे सहेज कर रखा है, कितने मेरी तरह समय के साथ भूल चुके! बेंगाली परिवार अपने में मगन है और मैं अपने विचारों में उलझा हुआ।

दिल ने जब-जब, जो-जो चाहा, होठों ने वो बात कही है। सही गलत है, गलत सही है। लीक छोड़ कर चलना या फिर एक लीक पर चलना ठीक?  क्या गलत है, क्या सही है?


किसी प्लेटफार्म पर देर तक रुकने के बाद फिर पटरी पर चलने लगी अपनी गाड़ी। भारत की सभी परम्पराओं को देखना, समझना, याद करना हो तो #रेल में सफ़र करना जरूरी है। लोहे के घर में पूरा भारत रहता है। 
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लोहे के घर में एक यात्री फोन में बात कर रहा है.. 'भाई आया था, मिठाई लाया था..दो किलो कोई अकेले थोड़ी न खाएगा! ...सब रखे हैं झोले में।' उधर की कोई बात सुनाई नहीं दे रही। हां, हूं कर रहा है बस। अब किसी को समझा रहा है.. रश भी होता है, लेट भी होता है..

दूसरा यात्री भी मोबाइल में घुसा हुआ है। वह ढूंढ-ढूंढ कर वाट्स एप के मैसेज पढ़ रहा है और वीडियो देख रहा है। नीचे वाली बर्थ पर चार और यात्री हैं। एक अभी खैनी रगड़ कर फ्रेश होने गया है। बाकी तीन कोई कांड करने का मूड बना रहे हैं! एक और यात्री है जो साइड अपर बर्थ पर लेट कर मोबाइल में फिलिम देख रहा है।

चार यात्रियों में एक यात्री जो फ्रेश होने गया था, लौट कर आ गया है। अब चारों में इशारे हो रहे हैं..यहीं कार्यक्रम कर दिया जाय? मैं सशंकित उन्हें देख रहा हूं। एक ने बैग से बीकानेरी आइटम निकाला! दूसरे ने बोतल!!! एक हमें देख थोड़ा लजाया। दाहिने हाथ के अंगूठे को मुंह के पास ले जाकर इशारे से बताया..हम लोग लेंगे थोड़ा! हम केवल मुस्कुरा के रह गए। ओह! तो यह कांड करने वाले थे ये लोग!

कार्यक्रम चालू है। प्लास्टिक के गिलास में ढल चुकी है शराब और पानी मिलाकर बन रहा है पैग। आसपास का माहौल शांत और इस कार्यक्रम के लिए सर्वथा अनुकूल है। कोई कह रहा है..बड़ी तीखी नमकीन है! कोई कह रहा है..धीरे धीरे! जल्दी क्या है? लेकिन चारों ने जल्दी जल्दी कार्यक्रम पूरा किया। बोतल खिड़की से बाहर और शराब पेट में। अब सभी ज्ञानी हो चुके हैं। एक को अधिक चढ़ चुकी है। तीनों को ज्ञान बांट रहा है। बीच बीच में लोग प्रश्न कर रहे हैं..

मुसलमान मछली कैसे हलाल करता है?

मछली तो पहले से हलाल होती है, उसको हलाल नहीं करना पड़ता।

चाइना विश्व की सबसे गंदी जगह है। वहां कीड़े मकोड़े सब खाते हैं। कुत्ते बिल्ली क्या, आदमी को भी खा जाते हैं।

आदमी को भी?

हां, आदमी को भी। चाइना विश्व में सबसे गंदी जगह है।

खाने के मामले में कोई टीका टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। जिसे जो पसंद है वो खाए। एकचुल में हिंदू को माछी, मुर्गा और बकरा ही खाना चाहिए। नियम से खाना चाहिए। झटके वाला खाते हैं तो झटके वाला खाओ!

कुछ भी अनर्गल बतिया रहे हैैं चारों। यह अच्छा है कि पीने के बाद भी देश की चिंता नहीं कर रहे। राजनीति की बातें नहीं कर रहे। गुजरात चुनाव की भी बात नहीं कर रहे। सब खाने की ही बात कर रहे हैं। लगता है पीने के बाद इन्हें भूख लग रही है। भूखे पेट कोई देश की चिंता नहीं करता। सिर्फ खाने की ही बात करता है।

मेरा अंदाजा सही निकला। एक ने कहा..खाना निकालो! टिफिन खुल गए। मैं उनके पास से हटकर सामने के लोअर बर्थ पर बैठ गया जहां एक यात्री फोन से बातें कर रहा था। वह अभी भी उसी से धीरे धीरे बात कर रहा है! अब उधर की आवाज भी सुनाई पड़ रही है। उधर कोई महिला है। पक्का उसकी पत्नी नहीं है। कोई पत्नी से इत्ती देर कैसे बात कर सकता है भला!

सामने चारों शरीफ दारूबाज चुपचाप खाना खा रहे हैं। बातें तो मछली, मुर्गा और बकरे की कर रहे थे लेकिन इनकी टिफिन से निकला.. वही आलू की भुजिया और पराठें! अखबार बिछा है और चारों खाए जा रहे हैं। इन्हे खाता देख अपनी भी भूख जाग रही है। रात के सवा नौ बज चुके और अब आने वाला है बनारस। 

17.12.17

छेड़छाड़

छेड़छाड़ करने वाले गंदे लड़कों ने प्यार करने वालों का जीना हराम कर दिया है. इतने सख्त क़ानून बनवा दिए कि लड़कों का लड़कियों को लाइन मारना भी मुश्किल हो गया है. पता नहीं कौन किस बात का बुरा मान जाय और शिकायत कर दे! फिलिम में नायक द्वारा नायिका को छेड़ने, छेड़ते-छेड़ते पटा लेने और अंत में विलेन से दो-दो हाथ करने के बाद दोनों के मिलन के सुखांत देख-देख हम बड़े हुए हैं. लड़की का भाई, पिताजी बाद में रिश्तेदार पहले तो हमें विलेन ही लगते थे. अब दृश्य बदल चुके हैं. पति को पत्नी से भी शराफत से बात करनी पड़ती है. छेड़छाड़ करने का मूल अधिकार इधर से उधर सरक गया प्रतीत होता है. कोई गोपी सहेलियों के साथ गर्व से गाना गाये..मोहें पनघट पे नन्द लाल छेड़ गयो रे..तब तो ठीक. लेकिन यदि उसने दुखी होकर यही गाना गाया तो कान्हा गए तीन साल के लिए जेल में.!

जब  युवती या महिला के प्रति अश्लील इशारों, टिप्पणियों, गाने या कविता पाठ करना भी अपराध की श्रेणी में आ गया है तो छेड़छाड़ करने वालों के साथ व्यंग्यकारों को इस विषय में लिखने से पहले क़ानून की धाराओं का अध्ययन कर लेना चाहिए. यह कहने से बचा नहीं जा सकेगा कि हमको तो फलाने ने लिखने के लिए चने के झाड़ पर चढ़ाया और हम चढ़ गए. गिरने पर हड्डी तो अपनी ही टूटनी है. चढ़ाने वाला तो यह कह कर निकल जाएगा कि हमने तो ऐसा नहीं कहा था.

पहले की बात अलग थी. स्कूल, कॉलेज से होकर विश्व विद्यायल पहुँचने के बाद ही हम देश भक्ति के फिलिम देखने के बाद बॉबी जैसी एकाध फिलिम देख पाते थे. शोले की बसन्ती जब तक ड्रीम गर्ल बनी विश्व विद्यालय से निकल कर घर/बाहर के आचार संहिता के घेरे में कैद हो गए. विश्व विद्यालय में लड़कों की तुलना में लड़कियां भी इतनी कम होती थीं कि अपने जैसे फटेहाल साइकिल सवार को कौन घास डाले? कहने का मतलब छिड़ने या छेड़ने के अवसर बेहद कम होते थे. आज के दौर के बुजुर्गों पर जो कामुक होने के आरोप लगते हैं कहीं यह इन्ही कुंठा ग्रस्त जीवन शैली अभिशाप तो नहीं? यह शोध का विषय है. इस पर समाज शास्त्री चिंतन मनन करें. 

अब तो पैदा होते ही हाथों में स्मार्ट फोन लेकर बड़े हो रहे हैं बच्चे. स्कूल, कॉलेज से विश्विद्यालय पहुंचते-पहुंचते कितने बॉय फ्रेंड/गर्लफ्रेड और कितने गठबंधन/ब्रेक अप! जितने प्यार करने वाले उतने विलेन. जितने विलेन उतने शोषण. इधर नहीं मिला तो उधर हाथ मारो. लड़कियों के स्कूल के बाहर लड़कों की भीड़. जब लड़कियां पढ़ेंगी तो जाहिर है नौकरी भी करेंगी. कामकाजी महिलाओं की सख्या भी पढेगी. शोषण करने की पुरुषवादी मानसिकता बदलते-बदलते बदलेगी. पीढी दर पीढी सुधार होगा मगर यह जो दौर है वह खतरनाक है. 

सरकार को सख्त क़ानून तो बनाना ही पड़ेगा. अब क़ानून को लागू करने वालों के लिए समस्या यह जान पाना है  कि कौन लड़की पार्क में अपनी मर्जी से राजी खुशी छिड़ी जाने के लिए आई है और कौन बहला फुसला कर लायी गयी है? शादीशुदा लड़कियां भी अब गाढ़ा सिन्दूर या घूंघट डाल कर तो आती नहीं कि पुलिस देखे और झट से पहचान ले कि यह तो विवाहित जोड़े हैं. इनके मौज मस्ती में छेड़छाड़ करी तो नौकरी गई. कौन जोड़ा कितना ताकतवर है?  कहीं ऐसा न हो कि इधर पकड़े, उधर फोन आ जाय! कोई सीधा सादा कमजोर हैसियत का जोड़ा मिले तो उसे पकड़ कर बंद किया जा सकता है. अब पुलिस भी उन्हीं मामलों में हाथ डाल सकती है जब कोई महिला शिकायत करे. आम आदमी के घरों की लड़कियां तो तभी शिकायत करेंगी जब पानी सर से ऊपर बहने लगे. बुरी नीयत से केवल टच करने, छू जाने या मात्र अश्लील बातों पर शिकायत करने वाली महिलाऐं आम नहीं कोई खास ही होगी. अब सरकार क्या करे? कानून बना दिया. अब? लागू कैसे करे? 

छेड़छाड़ रोकना मात्र सरकार का काम नहीं है. इसके लिए समाज को भी मानसिक रूप से तैयार होना होगा. यह संभव है कि सरकारें बलात्कारी को यथाशीघ्र कड़ी से कड़ी सजा दे जिससे कोई बलात्कार करने की सोच भी न सके लेकिन मात्र सरकार के भरोसे छेड़छाड़ रुकने से रहा. जितने प्यार करने वाले बढ़ेंगे, उतने विलेन भी पैदा होंगे और उतनी छेड़छाड़  की घटनाएँ भी बढ़ेगी. समाज में बदतमीजी रुक जाए तो समझो गंगा नहा लिए. प्यार करना तो प्राणी मात्र का प्राकृतिक स्वभाव है, यह कैसे रुकेगा? और यह रुकना भी नहीं चाहिए. वैसे तो यह मां-बाप के लिए भी कठिन हो चला है लेकिन फिर भी अब लड़कियों के साथ घर के लड़कों को भी नसीहत देने की जरूरत है. जब तक आपने उनके हाथों में स्मार्ट फोन नहीं पकड़ाया है शायद आपके दबाव में आ ही जांय! और बात मान लें कि हमें किसी लडकी से बदतमीजी नहीं करनी है. मतलब वो काम नहीं करना है जो करने से लडकी मना कर दे. 

जमाना बदल रहा है. यह बदलाव का दंश है. इस दंश से बचने के लिए सभी को मिल बैठ कर सोचना पड़ेगा. समाज को सही दिसा में ले चलने की जिम्मेदारी जितनी घर के अभिभावकों की है उतना ही आज के युवाओं की भी है. आज नहीं तो कल वे भी बड़े होंगे और उनके बोए बबूल के कांटे उन्हें ही अधिक चुभेंगे. अपने राम का क्या है! जैसे वो दौर देखे वैसे ये दौर भी झेल लेंगे. अब आज के दौर में यह तय कर पाना मुश्किल है कि सुपर्नखा छेड़ी गई थी कि राम/लक्ष्मण को छेड़ने पर उसे उसके कर्मों का फल मिला था! जय राम जी की.

सुबह की बातें-7

सुबह उठा तो देखा-एक मच्छर मच्छरदानी के भीतर! मेरा खून पीकर मोटाया हुआ,करिया लाल। तुरत मारने के लिए हाथ उठाया तो ठहर गया। रात भर का साफ़ हाथ सुबह अपने ही खून से गन्दा हो, यह अच्छी बात नहीं। सोचा, उड़ा दूँ। मगर वो खून पीकर इतना भारी हो चूका था क़ि गिरकर बिस्तर पर बैठ गया! मैं जैसे चाहूँ वैसे मारूं। धीरे-धीरे मुझे उस पर दया आने लगी। आखिर इसके रगों में अपना ही खून था। मैंने उसे हौले से मुठ्ठी में बंद किया और बाहर उड़ा दिया। इस तरह वह लालची अतंकवादी और मैं सहिष्णु भारतीय बना रहा।

संडे की नींद मोबाइल के अलारम से नहीं, मित्र के फोन काल से खुलती है। मोबाइल में नाम पढ़ा तो चौंक गया..रावत जी! बहुत दिनों बाद किसी शतरंज के खिलाड़ी ने याद किया। शतरंज खेलना तो वर्षों से छूट ही चुका है। अब लगता है ये हमको हरा के ही मानेंगे! कोई जमाना था जब शतरंज खेलते सुबह से शाम हो जाती थीं। गुलाब पान वाले की अडी में जब हम लोगों की बाजी जमती तो लोग खड़े होकर, मोमबत्ती जला कर भी शतरंज देखते। लेकिन आज इतनी सुबह!

नमस्कार! सब ठीक तो है?

संडे को तो आप मार्निंग वॉक करने जाते हैं न? हम भी चलेंगे।

हां, सूर्योदय के बाद चलेंगे अभी तो अंधेरा है।

सूर्योदय हो चुका पण्डित जी! सुबह के सात बज रहे हैं। रजाई से मुंह बाहर निकालिएगा तब ना।
तब निकलिए! गुलाब की दुकान पर मिलते हैं।

साइकल चला कर जब पान की दुकान पर पहुंचे तो वे सड़क किनारे खड़े हो, एक टक ताकते हुए मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। न मेरा आना जान पाए न साइकिल खड़ी करना। मैंने हाथ हिलाया..

उधर क्या देख रहे हैं?

अरे! किधर से आ गए!

रावत जी को देखकर झटका लगा। जिस्म ठीक ठाक था लेकिन पूरे बाल झक सफेद हो चुके थे!

आप के बाल तो पूरे सफेद हो चके हैं? बूढ़े हो गए आप तो!

आपके काले हैं क्या? जब से रिटायर हुए हैं हेयर डाई लगाना छोड़ दिए। आप छोड़ दीजिए आपके भी सफेद हो जाएंगे।

अब यह दूसरा झटका था। मतलब डाई लगाना छोड़ दें तो अपने बाल भी ऐसे ही सफेद दिखेंगे! हम कितने भ्रम में जीते हैं!

डाई न लगाते होते तो इतनी जल्दी सफेद न होते। लेकिन अब मन नहीं करता। क्या फ़र्क पड़ता है! बेकूफी किए जो डाई लगाना शुरू किए।

शतरंज ?

शतरंज भी छूट गया।

आज कैसे याद किए?

लोहे के घर के अलावा आप की और भी दुनियां है पण्डित जी। आप सब भूल चुके हैं। आप ने नहीं याद किया तो हमने सोचा संडे को तो मिलेंगे ही, उसी समय आपको पकड़ते हैं। सुबह की सैर भी हो जाएगी, आप से भेंट भी। कैसी रही ये वाली चाल?

अरे! इसका तो कोई जवाब ही नहीं। बढ़िया आइडिया है।

Image may contain: one or more people, people standing and outdoorखंडहर वाले लॉन में धमेख स्तूप के पीछे से निकलकर सूर्यदेव थोड़ा ऊपर आ चुके थे। खंडहरों के बीच एक अकेली विदेशी महिला सेल्फी लेते हुए अपना ही वीडियो बना रही थीं। इक्का दुक्का पर्यटक आने लगे थे। स्तूप पर कबूतर कम और कौए अधिक बैठे थे। अकेले घूमने में सिर्फ देखना और महसूस करना होता है, कोई मित्र साथ हो तो महसूस की हुई हर बात जुबां पे आ जाती है। मैंने रावत जी को छेड़ा..

धमेख स्तूप में भगवान बुद्ध की अस्थियां हैं क्या इसलिए स्तूप पर कबूतरों से अधिक कौए बैठे हैं?

रावत जी हंसने लगे...कौए कहां कम हैं पण्डित जी? हर जगह कबूतरों की तुलना में कौए अधिक पाए जाते हैं।
और गिद्ध? गिद्ध क्यों गायब हो गए?

गिद्ध जब जान गए कि आदमी के रहते मांस मिलना मुश्किल है तो कहीं मर/खप गए होंगे!

हमने एक दो चक्कर और लगाए। मौसमी फ़ूल खिल चुके थे। एक ग्रुप अब धर्मराजिका स्तूप के पास बैठकर पूजा अर्चना कर रहा था। अकेली विदेशी महिला अभी भी अपनी सेल्फी/वीडियो बनाने में मगन थी। मुझे लगा...
एक हम ही नहीं पागल, बेचैन हजारों हैं।

लोहे का घर-33

भण्डारी स्टेशन जौनपुर के प्लेटफार्म नंबर 1 पर एक ट्रेन दुर्ग-नौतनवां 18201आधे घंटे से अधिक समय से खड़ी है। दुर्ग से आई है और शाहगंज आजमगढ़ होते हुए गोरखपुर नौतनवां जाना है। इसके परेशान यात्री गोल बनाकर स्टेशन मास्टर के कमरे के बाहर खड़े हैं। स्टेशन मास्टर यहां नहीं बैठता। लोग कह रहे हैं..गार्ड भाग गया! स्टेशन मास्टर को फोन किया, वो कह रहा है..15 मिनट में कोई व्यवस्था करते हैं। जितने लोग उतनी बातें। कोई कह रहा है..गार्ड आएगा तो ड्राइवर भाग जायेगा! स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है।

एनाउंस हो गया.. गाड़ी चलने को तैयार है। सिंगनल हो गया। हॉर्न बज गया। भीड़ अपने अपने डिब्बे में चढ़ी। ट्रेन चल दी। कोलाहल शांत हुआ। अब प्लेटफार्म में कम लोग शेष रह गए हैं। एक ट्रेन की सकुशल विदाई हुई है प्लेटफार्म से। एक लड़की की विदाई के बाद शादी के लॉन जैसा सन्नाटा पसरा है चारों तरफ।
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भण्डारी पर भोले की आरती खतम हुई। यूं तो हांफते-डांफते बिफोर आ गई लेकिन आरती से चूक गई गोदिया। आजकल जाड़े में आरती का समय बिफोर हो गया है। भोग भी मौसम और सुविधा के हिसाब से मिलता है भगवान को!

राइट टाइम चली है गोदिया। चलाने वालों की कृपा बनी रहे तो यही ट्रेन है जो सही समय पर चलती है। अक्सर भीड़ भी नहीं होती लेकिन आज भीड़ है। मौसम के हिसाब से अब लोग शाम ढलते ही बर्थ खोल कर बिस्तर बिछा लेते हैं। चाहे जिस ट्रेन से लौटें दो चार रोज के यात्री मिल ही जाते हैं।

एक बच्चा रो रहा है। एक लड़का मोबाइल हाथों में लिए सो रहा है। एक बुजुर्ग खर्राटे भर रहे हैं। रोते बच्चे को थपकी दे कर घुमा फिरा कर मां की गोदी में लिटा कर बगल में बैठा है बच्चे का बाप। उसके बस का नहीं था चुप कराना। मां शाल ओढ़ाकर करा रही हैं स्तनपान। अब चुप हो, सोने जा रहा है बच्चा। सामने बैठे अनवरत बोलते यात्री से हाथ जोड़ कर निवेदन कर रहा है निरीह पति..'प्लीज चुप हो जाइए! फिर जग जाएगा तो जल्दी नहीं उठेगा बच्चा।' बोलने वाला दयालू निकला! तुरन्त चुप हो गया। इस दर्द से पक्का यह भी गुजरा है, कभी न कभी।

ट्रेन हवा से बातें कर रही है। एक पुल गुजरा है। पुल के थरथराने के साथ घनघनाई है पूरी ट्रेन भी। दर्द कभी एक तरफा नहीं उठता। बस तटस्थ हो दोनों को महसूस करने की बात है।
बच्चा सो रहा है। कितना सुकून है मां की गोद में! न पुल के थरथराने से न ट्रेन के घनघनाने से। मां की गोद से बच्चा नहीं उठता, किसी के शोर मचाने से।

लोहे के इस घर में कुछ दूर दूसरा बच्चा भी है। वह तोतली जुबान वाला चंचल बच्चा है। ऊपर बर्थ में लेट कर लोहे के रौड को हाथों से पकड़े, दीवार में पैर पटक रहा है। मुंह से तोतली जुबान में कुछ न कुछ बोले जा रहा है। ट्रेन किसी छोटे स्टेशन से गुजरते वक्त बदलती है पटरियां तो झूला झुलाते हुए चलती है। बच्चा झूला झूलते हुए मजे ले रहा है। मज़ा का क्या है! बस आना चाहिए। जितना जमाने के दर्द और चिन्ता से मुक्त है प्राणी, उतना सरल है मज़ा लेना। किसी ने खूब कहा है..

नींद तो दर्द के बिस्तर में भी आ सकती है
तेरे बाहों में सर हो, यह जरूरी तो नहीं।।


गहरी नींद सो रहा है एक रोज का यात्री। बनारस में इसे जगाना पड़ेगा वरना हो सकता है आज घर न पहुंच पाए।
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लोहे के घर में खाली-खाली बर्थ पर आराम से लेटे हैं हम और बैंक के मनीअर्जर साहब। ऊपर से लेकर सामने की लोअर अपर बर्थ में कहीं कोई नहीं है। पूरी बोगी खाली नहीं है, दूसरे यात्री हैं लेकिन अपना इलाका सन्नाटेदार है।

यह किसान है, अपने साथ के साथी इसे छोड़ गोदिया  पकड़ने गए हैं। शाम के ८ बजे के आस पास जौनपुर के भण्डारी स्टेशन पर जब दोनों ट्रेनें अलग अलग प्लेटफार्म पर साथ साथ खड़ी होती हैं तो बनारस जाने वाले यात्रियों में अजीब सा ऊहापोह हो जाता है। इसे पकड़ें या उसे पकड़ें, मंजिल तक कौन पहुंचाएगी पहले? २० मिनट पहले पहुंचने के लिए लोग कभी इधर तो कभी उधर भागते फिरते हैं। उनके जाने से हमें पूरा इलाका खाली मिल गया। गोदिया बनारस तक नॉन स्टॉप है और इसे दो स्टेशन रुकना है।

अपनी #ट्रेन पहले चली मगर एक स्टेशन चल कर रुक गई है। लगता है यहीं क्रास कराएगी गोदिया को। निर्णय गलत होने का मातम मनाएं या फिर खाली बर्थ मिलने का जश्न!

अरे! यही चल दी!!! निर्णय भी सही और खाली बर्थ का सुख भी..किस्मत साथ चल रही है। #भारतीय_रेल है, कब क्या करेगी कुछ भी सटीक नहीं कहा जा सकता। प्लेटफार्म पर आओ तो केवल ट्रेन का नंबर पढ़कर मत बैठ जाना, यह भी देख लो कि रेल का इंजन किस ओर है! पता चला उत्तर जाने के बजाय दक्खिन चले गए! सोचा अप वाली है, १२ घंटे लेट डाउन वाली निकली!!! ट्रेन के डिब्बों में दोनों नंबर लिखे होते हैं।

एक स्टेशन बाद फिर रुकी! मनीअर्जर साहब चौंक कर उठे। हाय! यहां क्यों रोक दी? यहां तो इसका स्टॉपेज नहीं है!

यह कहां लिखा है कि ट्रेन स्टॉपेज पर ही रुकेगी? रेलवे ने कोई प्रमाण पत्र जारी किया है क्या?

मनीअर्जर साहेब फिर दुखी हुए। लगता हैं यहां क्रास कराएगी गोदिया को। बड़ी गलती हुई। गोदिया ही पकड़नी चाहिए थी। हम भी हां हूं कर अफसोस मानते हुए लिखे जा रहे हैं। तकलीफ इस बात की नहीं है कि हम लेट हो रहे हैं, तकलीफ यह है कि वो हमसे पहले घर पहुंच जाएंगे। हमारा निर्णय गलत उनका सही हो जाएगा।

एक लम्बा हारन सुनाई पड़ा। अपनी ट्रेन फिर चल दी! हम फिर खुश हो गए। अपनी ट्रेन फिर अगले स्टेशन पर रुकी और फिर चल दी! हम फिर खुश हो गए। अपने दोनों स्टॉपेज से निकल गई किसान। अब गोदिया इसे नहीं पाएगी। वे अब पीछे ही रहेंगे, हम पहले पहुंचेंगे बनारस।

सफ़र करने वाले पल-पल खुश होने और उदास होने के बहाने ढूंढ लेते हैं। निर्णय सही रहा तो खुश होते हैं, निर्णय गलत रहा तो अफसोस करते हैं। साथियों को कहते सुना है..इतनी मेहनत पढ़ाई के समय कर लिए होते तो आज हम भी अफसर होते। सफ़र के वक़्त जो अच्छा लगता है, हम अक्सर उसी रास्ते पर चल पड़ते हैं। गाड़ी जब तक पटरी पर चलती रहती है खुश होते रहते हैं। जब गाड़ी पटरी से उतरने लगती है तब यही कहना पड़ता है...

लक्ष्य तो दृढ़ थे मेरे प्रारंभ से ही किन्तु हर घटना अचानक घट गई..

गोदिया में बैठे यात्री अभी यही कह रहे होंगे मगर भारतीय रेल और किस्मत कब पलटी खाए और हम फिर पिछड़ जाएं, कुछ भी निर्धारित नहीं है।

अपनी ट्रेन फिर किसी स्टेशन पर रुकी है और मुझे ग्रीन सिगनल की प्रतीक्षा है।

सूर्यदेव निकल रहे हैं और पटरी पर चल रही है अपनी गाड़ी। यह वाराणसी-सुल्तानपुर पैसिंजर है जो कैंट से ठीक ७ बजे छूट जाती है और ८.२० में पहुंचा देती है जौनपुर। पहले मनमर्जी चलती थी, रोज के यात्रियों ने प्रभु जी के दरबार में कई प्रार्थना पत्र डाले और प्रभु कृपा से यह निर्धारत समय पर चलने लगी।

आम आदमी सही समय पर चलने वाली पैसिंजर पा कर भी खुश हो जाता है, उसे बुलेट की कोई आकांछा नहीं है। पैसिंजर ट्रेन लोहे का वह घर है जिसमें आम के साथ गरीब भी रहते हैं। इस घर में अमीर, गरीब और मद्यम सभी घुलमिल कर एक वर्गीय हो जाते हैं। यहां उच्च और निम्न के साथ कोई भेदभाव नहीं रहता। भारत में समाजवाद पैसिंजर ट्रेन में ही देखने को मिलता है।जब एक्सप्रेस छांटा(धोखा) देती है तो सभी के लिए यह जीवन रेखा(लाइफ लाइन) बन जाती है।

यह अपने हिसाब से एक घंटे पहले चलती है। अनुकूल समय २०४९ फॉट्टी नाइन का है लेकिन साथी कहते हैं अब वह स्वीट पॉयजन (मीठा जहर) हो चुकी है! जब से मुगल सराय का नाम दीन दयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन होने की घोषणा हुई तब से लेट चलने लगी! हावड़ा से चलती है और वाराणसी से १८ किमी दूर मुगल सराय तक लगभग रोज सही समय ७.३० तक आ जाती है लेकिन वाराणसी कैंट अपने निर्धारित समय ८.२५ पर नहीं आ पाती। १८ किमी की दूरी तय करने में इसे एक घंटे से अधिक का समय क्यों लगता है? यह रोज के यात्रियों के लिए एक अनसुलझी पहेली है जिसे साथी प्रायः ट्रेन की प्रतीक्षा में सुलझाते पाए जाते हैं।

ऐसा नहीं कि #रेलवे अपनी पटरी से उतर गई है। इधर खूब काम हुए हैं। पटरियों की मरम्मत से लेकर प्लेटफार्म के नवीनीकारण तक कई काम हैं जो अपने पूर्वांचल में होते दिखते हैं। सभी का हाल तो नहीं पता लेकिन कैंट स्टेशन का तो काया पलट हो रहा है। नई स्वचालित सीढ़ियों से लेकर लिफ्ट तक लग चुके हैं। प्लेटफार्म के पत्थर बदले जा चुके हैं। स्थाई और टिकाऊ काम खूब हो रहे हैं। सिवाय ट्रेन को निर्धारित समय पर चलाने के शेष सभी काम हो रहे हैं। ट्रेनें निर्धारित समय पर चलने लगे तो फिर भारतीय रेल से किसी को कोई शिकायत न रहे।

इस दिशा में एक अच्छी पहल यह देखने को मिल रही है कि ट्रेनें कैंसिल हो रही हैं। यह सही है। लेट चलाने से अच्छा है ट्रेन चलाया ही न जाय। जितनी क्षमता हो उतनी ही ट्रेन चले, शेष निरस्त कर दी जाय। सभी का समय मूल्यवान होता है। ट्रेन नहीं रहेगी तो जनता कोई दूसरा विकल्प ढूंढ लेगी। जैसे आज फोट्टी निरस्त है तो हमने पैसिंजर पकड़ लिया।
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का पकड़ला ?
टाटा पकड़ली!
टाटा जौनपुर में ना रुकत
रुक ग य ल।


शाम के समय बनारस जाने वाले रोज के यात्री नॉन स्टॉप #ट्रेन पकड़ कर खुश हैं। जफराबाद स्टेशन पर भी इसकी चाल धीमी है, यहां से भी चढ़ गए लोग।

टाटा का क्रेज है रोज के यात्रियों में। सुबह बनारस से जौनपुर आते समय भी सप्ताह में दो दिन (मंगलवार और बृहस्पति वार) इसके दर्शन होते हैं। सुपर फास्ट है तो मात्र ४० मिनट में जौनपुर पहुंचा देती है। जौनपुर में इसका स्टापेज नहीं है लेकिन एक स्टेशन पहले जफराबाद में धीमी होती है। रोज के यात्री चढ़ते हैं और जफराबाद में चलती ट्रेन से कूद-कूद कर उतरते हैं। पिछले साल एक साथी कूदने के चक्कर में पटरियों और प्लेटफार्म के बीच फंस कर स्वर्गवासी हो चुके हैं। कुछ दिनों तक तो लोग दुर्घटना से व्यथित हुए फिर सब भूल भाल कर इस पर चढ़ने लगे। समय से दफ्तर पहुंचने की चिंता में जान हथेली पर लेकर टाटा में चढ़ते हैं। रोज के यात्रियों में एक स्लोगन काफी चर्चित है...टाटा के दीवाने कभी कम न होंगे, अफसोस! हम न होंगे।

आज शाम के समय टाटा अकस्मात मिल गई! लेट थी और आगे रेड सिगनल था। इसे रुकना ही था। बनारस में तो इसका स्टॉपेज है ही। सुपर फास्ट है तो इसकी चाल भी मस्त है। लोग खुश हैं कि आज जल्दी घर पहुंच जाएंगे।

ट्रेन में जहां हम बैठे हैं वहां प्लास्टिक के तीन कूपे रखे हैं। पहली बार देखा तो अलीबाबा और चालीस चोर वाले कूपे लगे! मैंने पूछा.. बाकी ३७ कूपे कहां हैं? वो बोला..तीन ही हैं। तेल भरे हो? (कैसे पूछता कि बस तीन चोर!) वो झुंझला कर बोला..तेल नहीं घरेलू सामान है। पहली बार समझ में आया कि कूपे में घरेलू सामान भी हो सकता है!

अगल बगल से समझ में न आने वाले बंगाली शब्द सुनाई पड़ रहे हैं। दो शब्द समझ में आए..राहुल और मोदी। मैं समझ गया लोहे के घर के यात्री देश की चिंता कर रहे हैं। देश की चिंता के लिए ट्रेन से बढ़िया कोई दूसरा स्थान नहीं होता। पल्ले से समय भी खर्च नहीं होता और देश की चिंता भी हो जाती है।

देश की चिंता शराबी भी करते हैं। उधर मुर्गा पक रहा है, इधर देश की चिंता हो रही है। खाली समय के लिए देश की चिंता बढ़िया काम है। उधर मुर्गा पक कर तैयार हुआ, इधर देश की चिंता खलास! पेट भरा और चल दिए अपने रस्ते। शाम के समय शराबियों के बीच एक संवाद होता है..आज देश क चिंता न होई?

यह ट्रेन है। यहां लोग बिहार के नीतीश और पश्चिम बंगाल की ममता से लेकर मोदी राहुल तक की कमियां, खूबियां गिना रहे हैं। नीतीश के नशा बन्दी का समर्थन कर रहे हैं और गुजरात में मोदी जी को जीतने वाला बता रहे हैं। लोगों की इस बात में सहमती है कि मोदी जी ने चुनाव के समय प्रधान मंत्री की गरिमा को कम किया है। इनकी बातों से पता चल रहा है कि प्रधान मंत्री के पद की गरिमा प्रधान मंत्री की कुर्सी से बड़ी होती है।