10.12.17

मेहमान नवाजी

मेहमान नवाजी शब्द में वो मजा नहीं है जो अतिथि सत्कार में है.  मेहमान का स्वागत तो मोदी जी भी कर सकते  है,अतिथि का कर के दिखाएँ तो जाने! मेहमान वो जो बाकायदा प्रोटोकाल दे कर आये. फलां तारीख को, फलां गाडी से, फलां समय आयेंगे. ये घूमना है, यह काम है और इतने बजे लौट जायेंगे. सब कुछ पूर्व निर्धारित. इसके उलट बिना तिथि बताये, छुट्टी और आपकी लोकेशन ताड़ कर जो सीधे आपके घर की काल बेल बजा दे वह  अतिथि कहलाता है. सब काम छोड़कर इस अकस्मात टपक पड़े अतिथि का  स्वागत करने में जो बहादुरी है वह प्रोटोकाल बता कर आने वाले अतिथि में कहाँ! सरल शब्दों में कहें तो भारत आने वाली ट्रम्प की बिटिया को आप मेहमान और नवाज शरीफ को बधाई देने अचानक लाहौर पहुंचे हमारेआदरणीय प्रधान मंत्री जी को आप अतिथि कह सकते हैं.

अतिथि तो हमारे पिताजी के समय आते थे. जब मोबाइल, नेट वर्क नहीं था. अब बिना तिथि बताये अतिथि बन कर आना या जाना बैड मैनर कहलाता है. अब मेहमान ही आते हैं. पहले आपसे फेसबुक में चैट करेंगे, आपकी सुविधा का ख्याल करेंगे, अपना पूरा प्रोटोकाल देंगे और फिर यदि आपकी इच्छा हो तभी ना नुकुर करते हुए मेहमान बनना स्वीकार करेंगे. इस पूर्व निर्धारित प्रोग्राम में सबसे पहले जो चीज है वह है रोमांच! यही सिरे से गायब हो जाता है. लेखक के मन में अब 'तू कब जाएगा अतिथि?' जैसे भाव आते ही नहीं तो वह इस विषय पर क्या खा कर व्यंग्य लिखेगा? लिखेगा तो कोरी गप्प मानी जायेगी. अब कोई शरद जोशी जैसा कैलेंडर की तारीखें दिखाकर प्राण फाडू ढंग से नहीं पूछ सकता..तुम कब जाओगे अतिथि? 

अव्वल तो मेहमान आने ही नहीं पाते. उनको न आने देने के लिए आपके पास पहले से सौ बहाने मौजूद रहते हैं. अब आप गैरतमंद हुए, वह बहुत अजीज हुआ और मुसीबत आ ही गई तो जाने की तारिख और समय पहले से  निर्धारित रहती है. मेहमान का स्वागत पान पराग से करना है या खैनी रगड़ कर चूना लगाना है सब पहले से ही तय रहता है. 

यह तो मानी जानी बात है कि जब मुसीबत आती है तो सबसे पहले अपने ही साथ छोड़ जाते हैं. इधर आप ने हिम्मत करके मेहमान को आने का न्योता दिया उधर श्रीमती ने मायके जाने का निर्णय सुना दिया!...'आप स्वागत करिए मित्र का, हम तो चले अम्मा से मिलने! कई दिनों से बीमार चल रही हैं!!! चार दिन हम तो नहीं झेल सकते. अब आप चाहें तो आने वाले मेहमान को सास की बीमारी के कारण अचानक ससुराली जाने की आवश्यकता बता कर आने से रोक सकते हैं या आप में दम हो तो अकेले के दम पर मेहमान का स्वागत कर सकते हैं. 

आप नेता है या अफसर हैं तो आपके लिए प्रोटोकाल निभाना कोई कठिन काम नहीं है. सारी मेहनत और खर्च आपके कार्यकर्ता या अधीनस्थ कर्मचारी करेंगे आपको तो सिर्फ अपना कीमती समय निकल कर मेहमान से गप्प लड़ाना है. नैय्या पर बैठकर गंगा आरती देखनी है या मुग़ल गार्डन में झूला झूलना है. मेहमान नवाजी में कोई कमी रही तो सारा दोष कर्मचारियों पर और सब अच्छा रहा तो क्रेडिट आपकी! आपके कुशल संचालन में क्या बेहतरीन ट्रिप रही!!!  

मेहमान नवाजी बड़े लोगों के लिए मौज मस्ती, आम लोगों के लिए मुसीबत का सबब और गरीबों के लिए किस्मत की बात होती है. आम आदमी के पूरे माह का बजट बिगड़ जाता है लेकिन अतिथि के आने से गरीब के भाग जाग जाते हैं ! गरीब अतिथि को एक भेली गुड़, ठंडा पानी और पूड़ी-सब्जी, दाल-भात खिलाकर इतना प्रसन्न होता है कि आज उसके घर भगवान पधारे! मेहमान के जाने पर उसके साथ पत्नी और बच्चे भी दुखी होते हैं और जाते समय हाथ जोड़ कर दिल से पूछते हैं..अब कब आयेंगे? हमने मोबाइल खरीद लिया है, बता कर आते तो रजाई भी मंगा लेते. आपको ठंडी भी नहीं लगती. खैर कोई बात नहीं..जल्दी आइयेगा. मुनौवां को छोड़ दीजिये एक दो महीने के लिए यहाँ. बच्चों के साथ खूब हिल मिल गया है. हमारी पत्नी को अम्मा कहता है. 

मेहमान नवाजी का लुत्फ लेना है तो किसी गरीब के घर प्रेम की गठरी कंधे पर लादे, खूब समय निकल कर इत्मीनान से, बिना किसी प्रोटोकाल के अतिथि बन कर जाइये. वैसे अब कोई किसी के घर प्रेम से सिर्फ मिलने के उद्देश्य से नहीं जाता. किसी शहर में घूमने या काम से गया तो रहने का ठिकाना ढूँढता है और मित्र भी मेहमान का हिडेन एजेंडा भांप कर कन्नी काटता है. दोनों साथ-साथ नहीं चलता. प्रेम और स्वार्थ एक साथ कहाँ रह पाते हैं!  स्वार्थी की भेंट प्रेमी से कैसे हो सकती है? मेहमान नवाजी के महल तो प्रेम के बुनियाद पर टिके हैं.    


Good Morning Sarnath

यह मेरा नया ब्लॉग है. इसमें सारनाथ के चित्र, उससे सम्बन्धित जानकारी और प्रातः भ्रमण के दौरान मन में आये विचार सुबह की बातें शीर्षक से प्रकाशित करने का मूड बनाया है. कोशिश है कि आज नहीं तो कल सारनाथ के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए यह एक बढ़िया लिंक बने. इस ब्लॉग से जुड़कर आप अपनी शुभकामनाएँ देंगे तो मुझे खुशी मिलेगी. लिंक इस ब्लॉग में ऊपर है और अलग से है यह रहा....Good Morning Sarnath

8.12.17

लोहे का घर-32

लघुशंका जाने से पहले पत्नी को जगा कर गये हैं वृद्ध। पत्नी की नींद टूटी। पहले बैग की तरफ निगाह थी, अब करवट बदल ऊपर के बर्थ की ओर मुंह कर सीधे लेटी हैं। नींद में दिखती हैं पर नींद में नहीं हैं। चौकन्नी हैं। सोच रही होंगी.. "सामने बैठा अधेड़ बड़ा स्मार्ट बन मोबाइल चला रहा है, दिखने में तो शरीफ दिखता है मगर क्या ठिकाना! ट्रेन में किसी पर विश्वास करना ठीक नहीं। जमाना खराब है।"

ऊपर साइड अपर बर्थ पर दो लड़कियां एक दूसरे की तरफ पैर कर लेट गई हैं। अभी कुछ देर पहले चिड़ियों की तरह चहक रही थीं। एक लड़की मुझे ही देख रही है। मैंने दो बार गरदन ऊपर करी, दोनों ही बार मुझे ही देख रही थी। दूसरी बार तो हल्की सी मुस्कान भी थी उसके चेहरे पर! पता नहीं मुझे लिखता देख यह क्या सोच रही है! लड़कियों के मन की बात समझना आसान है क्या?

बुजुर्ग आ गए। वृद्धा अब चैन से सो रही हैं। ट्रेन को रुका देख पूछ रही हैं...कोई स्टेशन है क्या? पता नहीं आम आदमी को यह विश्वास कब होगा कि ट्रेनें स्टेशन पर ही रुका करती हैं!

छोटे छोटे स्टेशन पर दौड़ते हुए चढ़ते हैं लोकल वेंडर। इस रूट में हरा मटर खूब बिकता है। खासियत यह है कि पूरे वर्ष हरा ही रहता है। बल्टा भर मटर लेकर जब कोई छोकरा बगल से 'हरा मटर' चीखते हुए गुजरता है तो नाक में मसालों की एक तीखी गंध घुस जाती है। साफ हवा आने और सांस लेने में कुछ देर लगता है। चाय बोलिए चाय, खाना बोलिए खाना..कोई दिन में चैन से सो नहीं सकता लोहे के घर में। शायद यही कारण है कि ट्रेन में चोरियां कम होती हैं।

एक हिजड़ा ताली पीटते, पैसे मांगते हुए निकला है बगल से। खूबसूरत साड़ी पहने है और बढ़िया मेकअप में सुन्दरी दिख रहा है। अपने ग्रुप से बिछुड़े हुए कबूतर की तरह फड़फड़ाते हुए निकल गया। ज्यादा देर किसी बर्थ के आगे नहीं रुका। थपड़ी बजाई, हाथ फैलाए और आगे बढ़ गया। जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला टाइप।

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भीड़ है लोहे के घर में। दून के अलावा आज कोई दूसरी ट्रेन नहीं आई। रोज के सभी यात्री कुम्भ मेले में बिछुड़़े भाइयों की तरह बड़े प्रेम से भंडारी टेसन में एक दूसरे से हाय हैलो कर रहे थे, चढ़ते ही टूट कर गिरे पारे की तरह ओने-कोने बिखर कर दुबक गए। कोई सामान की तरह ऊपर टंगा है, कोई कहीं अड़स कर बैठा है और कोई मायूसी से टुकुर-टुकुर ताकते हुए खड़ा है।

बगल में साइड लोअर बर्थ पर तीन लोग बैठे हैं। दो लोग मूंगफली खा रहे हैं और छिलके जमीन पर बिखेरते हुए देश की चिंता कर रहे हैं। दोनो के बीच बैठे एक बुजुर्ग घड़ी देख रहे हैं और रेलवे को कोस रहे हैं..'तीन बजे इसे बनारस पहुंच जाना था, अभी तक यहीं है। कोई काम ठीक से नहीं हो रहा है!' मूंगफली के छिलके जमीन पर बिखेरने वाले भी हां से हां मिला रहे हैं।

मैंने कहा..आप लोगों को भी छिलके यूं नहीं बिखेरने चाहिए थे। नहीं? वे मेरी बात से सहमत होते हुए पहले की तरह फर्श गंदा करते रहे और लेट होने के लिए व्यवस्था को कोसते रहे। यह अच्छा रहा कि उन्होंने मेरी बातों को सुना अनसुना कर दिया। पलटकर झगड़ा नहीं किया। कह सकता था..रेलवे क्या तुम्हारे बाप की है? मैं भी एक बार उपदेश दे कर चुप हो गया। 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे।' दूसरे ठीक से काम करें लेकिन हम नहीं सुधरेंगे। इनके उतरने के बाद दूसरे यात्री चढ़ेंगे और वे गंदगी के लिए रेलवे को कोसेंगे!

मेरे सामने चार यात्री बैठे हैं। दो पुरुष, दो महिलाएं। महिलाएं एक दोना हरा मटर खरीद कर एक ही चम्मच से बारी-बारी खा रहे हैं। पुरुषों में परस्पर इतना प्रेम दुर्लभ है। दांत काटी यारी हो तो अलग बात है। बगल में एक बंगाली प्रौढ़ जोड़ा है। दोनों गुमसुम बैठे हैं और अजीब नजरों से इधर उधर देख रहे हैं।

भांति भांति के वेंडर चढ़ते हैं लोहे के घर में। हरी ताजी मटर, गरम चाय से लेकर खाना पानी तक। अभी एक पुस्तक बेचने वाला दस रुपए में जनरल नॉलेज बेच रहा था। अभी एक नकली मोतियों, रुद्राक्ष की माला बेचने वाला काशी के नाम पर माला बेच रहा है।

जलालपुर में एक ग्रामीण जोड़ा चढ़ा। मूंगफली के छिलके बिखेरने वाले बैठे रहे, बुजुर्ग को उठना पड़ा। सामने वाले बर्थ पर उनको एडजस्ट किया गया। अब नए पुराने सहयात्री एक ही घर के निवासी हो गए। सभी अब अच्छी अच्छी बातें करते हुए देश की चिंता में लीन हो गए। ट्रेन के सफर में देश की चिंता करना बड़ा सुरक्षित है। पल्ले का कुछ नहीं जाना, समय भी नहीं।

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आजाद वीजा 

कल शाम लोहे के घर में एक गिरमिटिया मिला। गांधी जी के समय दक्षिण अफ्रीका जाने वाला नहीं, इक्कीसवीं सदी में सउदी अरब जाने वाला। उसकी बातों से पता चला कि वह चार साल वहां रहकर आया है। मुझे उससे बात करने का मन किया।

तब तो खूब नोट कमाए होगे?
हां हां, क्यों नहीं! वहीं के पैसे से घर बनाए, बिटिया की शादी करी और भी एक दो काम किया जो यहां रहते तो जिंदगी भर नहीं कर पाते।
कहां के रहने वाले हो?
वर्धमान, पश्चिम बंगाल।
जब इत्ती कमाई थी तो लौट क्यों आए?
अब कितना मेहनत करते? उमर भी हो गई।
तुम तो अभी ४०से अधिक के नहीं लगते?
हां.. वहां का काम बहुत मेहनत वाला है।
क्या करते थे?
कुछ भी। कोई काम करने में संकोच नहीं किया। झाड़ू भी लगाया, मजदूरी भी करी। वो टेंट टाइप घर नहीं होता? हां, वहां रेत ही रेत है। एक घर बनाने का 200 रियाल मिलता था।
#रियाल! एक रियाल कित्ते का होता है?
18 रुपए का।
मतलब एक घर बनाते थे तो ३६०० पा जाते थे!
हां।
और कित्ता समय लगता था एक घर बनाने में?
२-३ घंटे।
अरे वाह! तब तो बहुत कमाई होती थीं!!
हां।
अब ई बताओ, गए कैसे? वीजा बनाए थे?
आजाद वीजा!
यह क्या होता है?
इसमें कोई प्रतिबन्ध नहीं होता। जो मर्जी काम करो। एक ने कम पैसा दिया तो दूसरे के पास चले जाओ।
कैसे बनवाए आजाद वीजा?
एक दलाल से!
कित्ता लिया?
एक लाख तीस हजार। बहुत अच्छा दलाल है। आपके पास पैसे कुछ कम हो न! वो कहता है..कमा कर लौटा देना।
तब तो बहुत अच्छा है! आप भाग्यशाली लगते हैं मगर किसी को धोखा भी देता होगा।
नहीं, किसी को नहीं। मैंने अपने भाई और बेटे को भी भेजा है वहां।

उसकी बातें सुनकर मैं गहरे सोच में डूब गया। गिरिराज किशोर और  पहला गिरमिटिया  याद आए। आजादी से पहले कैसे धन कमाने के चक्कर में अनुबन्ध के तहत भारतीय दक्षिण अफ्रीका जाते थे और वहां जा कर गुलामों से बदतर जिंदगी जीते थे। वह तो भला हो मोहन दास का जिन्होंने वहां जा कर उनके लिए लंबी लड़ाई लड़ी और उन्हें एहसास दिलाया कि उन्हें भी सम्मान के साथ जीने का हक है। वे सिर्फ गोरों के काले गुलाम नहीं हैं। इसका मतलब इक्कीसवीं सदी के गिरमिटिया विदेशों में आजाद वीजा लेकर मौज करते हैं।

मैंने उससे फिर पूछा..
किसी अनुबन्ध के तहत जाते होंगे? मन मर्जी कैसे काम कर सकते हैं?
वैसे भी जाते हैं। किसी कम्पनी के कर्मचारी बन कर। उसमे फिर उसी के यहां काम करना होता है। काम छोड़ा तो पुलिस पकड़ लेती है।
अरे!
हां। अपना तो आजाद वीजा था !

अब मुझे नहीं पता बन्दा कित्ता सच बोल रहा था, कित्ता हांक रहा था लेकिन उसके चहरे से ग़ज़ब का आत्मविश्वास झलक रहा था।

2.12.17

सुबह की बातें-6

साइकिल ले कर भोर में सैर को निकला तो मॉर्निंग हो ही रही थी और थोड़ा गुड-गुड लगना शुरू ही हुआ था।  पूरा गुड लगता कि सजे हुए मैरिज लॉन दिखने लगे। भीगी_पलकें का समय था। बिदाई की बेला थी। घर की अजोरिया परायों की होने वाली थी। अपना भी मन शोकाकुल हो इससे पहले तेज पैडिल मार कर आगे बढ़ गया। आगे दूसरा मैरिज लॉन दिखा। दरवाजे पर कुत्ते ही दिखे, पलकें भीतर भीगी हो रही होंगी। आगे पान की दुकान पर साइकिल खड़ी कर पैदल पैदल हो गया। पान वाले ने तपाक से उंगली करी..के के बोट देहला? हमने भी उंगली दिखाई.. जेहके देहले होई, जाई त तोहरे में! पता नहीं क्या समझा, जोर से ठहाके लगाने लगा। पता नहीं अपनी हर सही बात को लोग व्यंग्य क्यों समझ लेते हैं!

अब मॉर्निंग हो चुकी थी। सड़क की मरकरी लाइट के बिना भी लोग दिखने लगे थे। पटरी पर एक ठेले के पीछे तीन बुढ़िया मूंगफली बीन रही थीं। जमादार झाड़ू से धूल उड़ा रहा था। दो लड़के सड़क के किनारे खड़े हो सूखे पत्ते जला कर धुआँ उड़ा रहे थे। मॉर्निंग बैड हो, फेफड़ों में धूल घुसे इसके पहले नकपट्टी चढ़ा लिया। धूल/धुएं के पीछे लोग मॉर्निंग वॉक/जॉगिंग कर रहे दिखे।

बुद्ध_मन्दिर का द्वार खुल चुका था। ज्ञान लेने वालों को पंक्तिबद्ध लाइन में खड़ा कर हांकता, ज्ञान देने वाला अनुशासित हो कर मन्दिर में प्रवेश कर/करा रहा था। हम दोनों से बच कर, बगल से निकल लिए। आजकल इसी में बुद्धिमानी है। ज्ञान देने और लेने वालों से बच गए तो समझो आप बड़े भाग्यशाली हैं।

भगवान बुद्ध की मूर्ति चमक रही थी। फूल हंस रहे थे। हम आगे बढ़े तो पंक्ति में वर्षों से खड़े अशोक के कटिंग किए हुए छतरी आकार के बूढ़े वृक्ष हवा के झोंके लेते मिले। हलकी सी भी हवा चलती है तो पीपल के पत्ते बच्चों की तरह खुश हो, ताली पीटते से दिखते हैं लेकिन अशोक बड़के ज्ञानी की तरह अविचलित जस के तस खड़े रहते हैं। अक्सर ऐसा ही होता है। ज्ञानी बच्चों की तरह मिलते हैं, बुद्धिजीवी अकड़े-अकड़े।

अशोक के नीचे पत्थर के बेंच पर बैठे बूढ़े घूम घाम, थक थुका कर आपस में बतियाते दिखे। एक बूढ़ा झगड़ालू  महिला की तरह हाथ नचाकर कुछ कह रहा था बाकी लाचार पुरुष की तरह सुन रहे थे।

लॉन में बने मंच का प्रयोग स्थानीय युवा सुबह योग के लिए करते हैं। उसमें दरियां बिछाई जा रही थीं। हीरन पार्क के बगल वाला नहर नुमा तालाब मरम्मत के बाद सूखा पड़ा था। कमल उखाड़े जा चुके थे। जमीन दरकने लगी तो तालाब के सड़ रहे, ठहरे पानी को बदलने की आवश्यकता महसूस हुई होगी। नई जमीन पर नए पौधे लगेंगे तो यह चमन और भी खूबसूत होगा। यह बात सभी समझते हैं।

भगवान बुद्ध के उपदेश स्थल का चक्कर लगाते देखा बुद्ध और उनके पांचों शिष्य हमेशा की तरह मूक बैठे हैं। मूर्तियां बोल नहीं सकतीं पर इन्हे देख ऐसा लगता है कि कभी बुद्ध ने बोला होगा, कभी शिष्यों ने सुना होगा। आज भी गुरु बोलते हैं, शिष्य सुनते हैं मगर दुनियां पहले से अधिक दुखी है! कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने बुद्ध के उपदेशों को एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया! या फिर बुद्ध ने कहा कुछ और हमने कुछ और ही समझ लिया! कुछ तो लोचा है।

बुद्ध मन्दिर से लौटते समय जैन मन्दिर के विशाल चिर युवा बरगद की याद आई। सोचा चलकर उन्हें प्रणाम करते हैं और चिर युवा रहने का मंत्र पूछते हैं। आखिर कब तक नहीं बताएंगे? हाय! मन्दिर का द्वार ही अभी बन्द था। यहां लोग कम आते हैं शायद इसीलिए जाड़े में पुजारी जी ने भी सूर्योदय के हिसाब से समय बदल दिया होगा। जब खुद भूख लगे, प्रसाद चढ़ाओ। पत्थर की मूर्तियां कुछ खाती थोड़ी न हैं, वे तो भाव की भूखी हैं।

सारनाथ के धमेख स्तूप वाले खंडहर पार्क का द्वार खुल चुका था। अंदर घुसा तो खंडहरों के उस पार धमेख स्तूप के पीछे सूर्यदेव निकलते दिखे। मैंने प्रणाम किया और मोबाइल से उनकी तस्वीर ले ली। मुझे लगा अपनी सुबह की पूजा संपन्न हुई। एक चक्कर लगा कर जब स्तूप के पास पहुंचा तो भक्त पूजा/ध्यान में लीन दिखे। एक पहले से तैयार फोटोग्राफर भक्तों की हर एंगिल से तस्वीरें खींच रहा था। भक्त श्रद्धा भाव से कुछ मंत्र भी पढ़ रहे थे। मेरे दुष्ट मन को लगा वे कह रहे हैं.. खींच मेरी फोटो! खींच मेरी फोटो!

यहां से निकलकर अडी में हर हर महादेव हुआ, चाय पान हुआ और कोई खास बात नहीं हुई। साइकिल उठाया, नकपट्टी चढ़ाया और बिटिया की लेडिज साइकिल के हैंडिल कैरियर में गोभी के दो ताजे फूल रख कर घर वापस आ गया। अपनी उम्र अब गुलाब के फूल लेकर जाने वाली नहीं रही।

29.11.17

लोहे का घर-31


ट्रेन ने बदली पटरियाँ 
लोहे के घर की खिड़की से 
हौले से आई और..
दाएं गाल को चूमकर 
गुम हो गई 
जाड़े की धूप।

..........


पुत्रों को सौंप
धानी चुनरिया
सन बाथ ले रही है
धरती माँ
पटरी पर चल रही है
अपनी गाड़ी।

........


सुबह के समय लोहे के घर की खिड़कियों से दिखते हैं सुनहरे धूप में नहाए स्वर्णिम खेत। खड़ी ज्वार/गन्ने की फसल हो या गाय/भैंस के मल से बने कंडे, यत्र तत्र सर्वत्र एक सुनहरी आभा बिखरी होती है। खेत के साथ खेतों की रखवाली के लिए तैनात बजुके भी दिखते हैं।
पंछियों को डराने के लिए किसान खेतों में बजुके खड़े करते हैं। चालाक पँछी आदमी के इन पुतलों से नहीं डरते। आकाश से उतर कर सीधे बजुकों के सर पर बैठते हैं। इधर-उधर ताकते हैं फिर पूँछ उठाकर, पँख फड़फड़ा कर पुतलों की बाहों से होते हुए खेतों में उतर, ढूँढने लगते हैं दाने। इसे देख एक बात समझ में आती है कि किसी को बहुत दिनों तक मूर्ख नही बनाया जा सकता।

अब प्रश्न उठता है कि इन बजुकों में अगर जान आ जाय तो क्या हो? स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय मानव प्रजाति के व्यवहार को देखते हुए तो यही लगता है कि लाख खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने की व्यवस्था करो, सबसे पहले खेतों के दाने तो बजुके ही उड़ाएंगे! पूछो तो सारा इल्जाम चिड़ियों पर!..जरा सी आँख लग गई थी साहेब। अब हर समय तो जाग नहीं सकता!
.......

लोहे के घर की बन्द शीशे की खिड़कियों से आ रही है सुर सुर सुर सुर ठंडी हवा। आमने सामने की बर्थ पर हम छः यात्री हैं और सभी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त हैं। सभी साथी हैं मगर सभी को एक दूसरे से ज्यादा कुछ और पसन्द है। किसी को फिलिम पसन्द है, किसी को मोबाइल गेम।
कमोबेस यही हाल कंकरीट के घरों का भी है। कहने को तो सभी एक परिवार के सदस्य हैं मगर सभी की रुचियाँ अलग-अलग हैं। सभी को अपनी जिंदगी जीने का अधिकार और खुला स्पेस चाहिए। यदि कोई किसी से अपने मन की बात करना चाहता है तो अगले के खाली होने तक उसे प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। बीच में टोका तो हो गया उपेक्षा का शिकार! उपेक्षा से आहत हुआ अहंकार। आहत दिल से उपजा क्रोध। क्रोध ने कराई बात। शुरू हुआ बेबात का झगड़ा। बहुत लफड़ा है। जीवन सरल भी हुआ है और कठिन भी।

एक अकेला अजनबी यात्री ऊपर बर्थ में पद्मासन लगा कर बैठा नीचे वालों को टुकुर टुकर ताक रहा है। अलग अलग मोबाइल से आ रही आवाजें सुन रहा है। शायद उसके पास मोबाइल नहीं है। युवा है लेकिन उसका हाल घर के दद्दू जैसा है। जो परिवार के सभी सदस्यों की बात चुपचाप सुनता रहता है लेकिन अपने मन की बात किसी से नहीं कह पाता। ऊपर वाले को दद्दू की तरह बस मंजिल की प्रतीक्षा है।
#ट्रेन देर से रुकी थी। लोग अकुला कर एक दूसरे से बात करने ही वाले थे कि चल दी। आजकल जब समस्या आती है तभी घर के सदस्य एक दूसरे से बातें करते हैं। अजी सुनते हैं? मुन्ना अभी तक कोचिंग से नहीं आया! पति हाँ, हूँ करते हुए करवट बदलता है तभी डोर बेल बज जाता है। मुन्ना आ गया। समस्या खतम। संवाद खतम। एक तो वैसे ही हम दो, हमारे दो वाला छोटा परिवार उप्पर से सभी के अपने अपने मूड। पहले घर में बच्चे रहते और रहतीं थीं भाभी, दादी। गीतों के झरने बहते थे, झम झम झरते कथा, कहानी।
ऊपर पद्मासन लगा कर बैठा बन्दा सुफेद चादर ओढ़कर सो गया। नीचे बैठे छ में से एक सदस्य अपनी मोबाइल बन्द कर खिड़की का शीशा उठाकर बाहर अँधरे में मंजिल झाँक रहा है। दो एक ही मोबाइल में कोई मजेदार फ़िल्म देख कर खिलखिला रहे हैं। नॉन स्टॉप ट्रेन फिर किसी छोटे स्टेशन पर देर से रुकी है।
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भारतीय रेल अच्छे अच्छों को अपने समय जाल में फंसा सकती है। सात बजे फरक्का को जौनपुर आना था वह अभी तक नहीं आई। उसके बदले ८.१० में आने वाली गोदिया ९.३५ में आ गई। हम यह सोच कर मन बहलाते रहे कि वह अब चल चुकी है, अब आ रही है। पहले ही कह देती की हम इतने देर से आएंगे तो इसे कौन पूछता? सब सड़क का रास्ता नहीं पकड़ लेते! अब आ गई है तो इत्मीनान से खड़ी है। सिंगल ट्रैक है, एक मालगाड़ी छूटी है अभी। अब जब तक वह अगले स्टेशन तक पहुंचेगी, इसे रुकना ही है। हम अब इसकी एक बोगी में लेट कर इसके चलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बोगी में कोई कह रहा है.. काशी जाना आसान नहीं। उसके कहने का आसय यह कि मोक्ष पाना इतना सरल नहीं है।
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अपनी गाड़ी पटरी पर चल रही है। इस दौर में जब पटरी से उतर जाने की खबर चर्चा में हो, गाड़ी का पटरी पर चलते रहना सुखद है। क्या हुआ कि अब तक मिल जानी चाहिए थी मंजिल लेकिन नहीं मिली! क्या हुआ कि आना था कब और आई है अब! क्या हुआ कि जब घर पहुंच कर, खा पी कर सो चुकना था हमें मगर मगर फंसे हैं, रस्ते में! देर से चली मगर बड़ी रफ्तार से चल रही है अपनी गाड़ी। रात के सन्नाटे में किसी पुल को थरथराती, किसी छोटे स्टेशन पर पटरियां बदलती, झूला झुलाती ट्रैक बदलती है #ट्रेन तो बड़ा मज़ा आता है।
कुछ सो रहे हैं और कुछ इतने रात को भी ऐसे चहक रहे हैं कि अभी सबेरा हुआ हो! जो दूर से यात्रा करते हुए चले आ रहे हैं और अभी दूर जाना है वे मुंह ढककर सो रहे हैं। जिन्होंने प्लेटफार्म पर लंबी प्रतीक्षा के बाद के बाद ट्रेन पकड़ने में सफलता पाई है, वे चहक रहे हैं। न जाने क्या है इस ट्रेन की मोहब्बत में कि रोज धोखा देने के बाद भी कभी बेवफा नहीं लगती। रोज कहते हैं कि न जाएंगे कभी इससे और रोज लगता है कि बस चढ़े नहीं कि घर पहुंच गए। मंजिल से प्यारा है इसका सफर। अजनबी भी लगने लगते हैं हमसफ़र!
अभी देर से किसी स्टेशन पर रुकी है। पक्का बता देती कि रात भर रुकी रहेगी तो सो जाते चैन से। मगर कभी पक्की बात न करना ही तो ट्रेन की जानमारू अदा है। सही बता देती तो चलने वाले हारन की आवाज में इतनी मिठास कहां होती!
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सुबह सबेरे एक युवक चलती #ट्रेन के दरवाजे पर बैठा खेत झाँक रहा था। हमने कहा...उठो! रास्ता दो। स्टेशन पास आ रहा है, उतरना है।
वह उठा तो उसका आसन दिखाई दिया। दरअसल वह लकड़ी की एक पटरी थी जिसके चारों कोनों पर पहिए लगे हुए थे! अब हमारा ध्यान इकहरे स्वस्थ बदन वाले युवक पर गया। वह अपने एक टाँग पर खड़ा था। दूसरा पैर घुटने से गायब था!
कहाँ जाना है?
ट्रेन अमृतसर तक जाएगी तो अमृतसर चले जायेंगे!
#दिव्यांग के लिए पूरी बोगी है, वहाँ क्यों नहीं बैठे?
उसने प्रश्न के जवाब में प्रश्न किया...वहाँ बैठते तो माँगते कैसे?
अब हमको समझ मे आया कि यह तो भिखारी है!
कब से भीख मांग रहे हो?
बचपन से।
पैर कब कटा?
जब सात साल के थे।
कोई दूसरा काम क्यों नही करते? एक पैर कटा तो क्या हुआ? स्व्स्थ हो, सभी दूसरे अंग सलामत हैं।
घर वाले करने नहीं देते। सब यही काम करते हैं!
तब तक अपना स्टेशन आ गया और हम उतर गए। किसी भिखारी को देख कौंध जाता है उसका भी चेहरा तो लगता है भीख मांगना भी एक काम है। 


लेखक

जब कोई बड़ा लेखक मरता है
हमारे पास आता है।
अखबारें करती हैं
उनकी चर्चा
छापती हैं
उनकी कविताएं, संस्मरण, कृतियाँ और,..
पुरस्कारों के नाम।
जब कोई बड़ा लेखक मरता है
यकबयक
जागृत हो जाता है
मृतप्रायः साहित्यिक समाज
चमकने लगती हैं
गोष्ठियाँ
राजनैतिक चर्चा छोड़
चाय पान की अढ़ियों में
होने लगती हैं
किसी चर्चित पुस्तक या प्रसिद्ध कविता पर
बातचीत।
जब कोई बड़ा लेखक मरता है
तब याद करते हैं हम उसे
अरे!
कौन सी तो पुस्तक थी इनकी?
हमने पढ़ी थी यार!
बहुत अच्छी थी।
हाँ, हाँ यह वाली कविता
क्या बात है!
अच्छा!
अब चलेंगे पुस्तक मेले में
तो याद दिलाना
खरीदनी पड़ेगी इनकी
कुछ प्रसिद्ध पुस्तकें
पढ़े नहीं तो
कितने बुद्धू लगेंगे हम
बुद्धिजीवियों में!
जब कोई बड़ा लेखक मरता है
स्थान पाता है
पढ़े-लिखे समाज में।

संघर्ष तो होगा

हम नहीं करेंगे
तुम नहीं करोगे
लेकिन वह जरूर करेगा
जिसे सहन नहीं होगा
संघर्ष तो होगा।

उतनी ही चलती है तानाशाही
जितनी झुक पाती है
रीढ़ की हड्डी
उतना ही रो पाती हैं
आँखें
जितने होते हैं
आँसू
पांच गांव मिल जाता
तो क्या
महाभारत होता?
संघर्ष तो होगा।

झूठ की ही नहीं
आँच अधिक होने पर
फूट जाती है
सच की भी हांडी!
गलत सही
सही गलत
कब तक होगा?
संघर्ष तो होगा।