12.5.18

लोहे का घर-43

भारतीय रेल में सफ़र करते करते जिंदगी जीने के लिए जरूरी सभी गुण स्वतः विकसित होने लगते हैं। धैर्य, सहनशीलता, सामंजस्य आदि अगणित गुण हैं जो लोहे के घर में चंद्रकलाओं की तरह खिलते हैं। कष्ट में भी खुश रहने के नए नए तरीके ईजाद होते हैं। कोई तास खेलता है, कोई मोबाइल में लूडो या शतरंज। एक ही मिजाज के चार पांच लोग हैं तो पप्पू, पपलू भी खेल सकते हैं। लोहे का घर एक ऐसा विश्राम स्थल है जहां रहने वाले कोई काम नहीं करते बल्कि आराम से बैठकर काम करने वालों की खिल्ली उड़ाते हैं।

ट्रेन बहुत देर से वीरापट्टी स्टेशन पर रुकी है। पास के गांव में अखंड रामायण चल रहा है। बड़े सुर में सुंदर कांड का पाठ हो रहा है। संपुट है..दीन दयाय बिरज संभारी, हरहूं नाथ मम संकट भारी।

कल शाम #ट्रेन एक छोटे से स्टेशन पर देर से रुकी थी और पास ही गांव में अखंड रामायण चल रहा था। संपुट अच्छा लग रहा था.. हरहूं नाथ मम संकट भारी।

आज जब सोने की तैयारी कर रहा हूं तो सामने घर में अखंड रामायण चल रहा है और लाउड स्पीकर का मुंह अपनी तरफ है। पाठ करने वाले इतनी जल्दी जल्दी पाठ कर रहे हैं कि कुछ समझ में ही नहीं आ रहा, सिर्फ कान फाड़ू शोर के बीच तबला अजीब ढंग से टन टन बज रहा है।  ऐसा लगता है पाठ करने वाले वाले ठेके पर बुलाए गए हैं जिन्हें रात भर में रामायण ख़तम करना है। बीच बीच में नया बेसुरा राग खूब खींच कर छेड़ते हैं और नए अंदाज में शोर करते हैं। सोच रहा हूं अगर सो नहीं पाया तो कल सुबह ट्रेन कैसे पकड़ाएगी?

अखंड रामायण का आज का संपुट है...

मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवहूं सो दशरथ अजिर बिहारी।

और मैं मन ही मन जप रहा हूं...

हरहुं नाथ मम संकट भारी!
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नाल वाले डिब्बे नू बैठा है। हां हां चलने वाली है ट्रेन.. हां हां बैठ गई ठीक से, जगह मिल गई।

लोहे के घर की खिड़की पकड़े प्लेटफॉम पर खड़ी हैं दो औरतें और चार बच्चे। ट्रेन में चढ़ाने आया एक बन्दा खाला के हाथ में मोबाइल पकड़ा गया है। खाला कभी उठती है, कभी बैठ जाती है लेकिन खड़े/बैठे मोबाइल से बातें किए जा रही हैं। बीच बीच में छोड़ने आई महिलाओं और बच्चों को हाथ भी दिखा रही हैं .. हां हां ठीक हूं..चली जाऊंगी, अब रख मोबाइल। महिला अब मोबाइल वापस कर खिड़की पकड़े खड़ी महिलाओं और बच्चों से बातें करने लगीं। प्लेटफॉर्म पर धूप है। धूप में खड़ी महिलाओं के चेहरों को देख अब ऐसा लग रहा है कि उन्हें अब रेल पर क्रोध आ रहा है..चल क्यों नहीं रही यह ट्रेन? अभी कुछ देर पहले जितना समय बात करने मिल जाय कम है, कहने वाली महिलाएं ट्रेन के न चलने से व्यग्र हैं।

#ट्रेन चल दी! सभी के मुर्झाए चेहरे खिल उठे। लंबी गूंज सुनाई पड़ी... बा आ आ य, बा आ आ य।
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आज लौह पथ गामिनी के संचालक महोदय की कृपा से जल्दी घर आ गए। आ गए तो टी. वी. खोलने का समय मिल गया। शांति की तलाश में सबसे पहले दूर दर्शन समाचार लगाया। आदरणीय प्रधान मंत्री जी की नेपाल यात्रा विषयक जानकारी प्राप्त हुई। कूल कूल वातावरण में नेपाली विदेश मंत्री से साक्षात्कार और दूसरी अच्छी अच्छी बातें सुनकर कलेजे में ठंड पहुंची।

सफ़र की थकान मिटी तो जिस्म में कीड़ा कुलबुलाने लगा। चैनल बदलना शुरू किया। एक चैनल में किम और ट्रंप की मुलाकात के साथ किम के जूते का राज खोला जा रहा था। सुनते ही फूट लिए।

एक चैनल में कुछ राजनैतिक विद्वानों को जुटा कर मूर्खतापूर्ण प्रश्नों के माध्यम से कौआ कांव मचाया जा रहा था। हम गधे की तरह कितना सुनते!

आई पी एल लगा कर मैच देखने लगे। ऋषभ पंत ने धूम मचा रखी थी। पंत की बैटिंग देख मजा आ गया।

एन डी टी. वी. में रविश कुमार प्रधान मंत्री के भाषणों में जो कमी थी उसे ही हाईलाइट करते रहे। ऐतिहासिक झूठ न बोलने की सलाह दे रहे थे। कुल मिला कर हारे थके विपक्ष को अपनी बुद्धि से ऊर्जा दे रहे थे।

म्यूजिक चैनल लगाया तो चिकी बम बम वाला गाना एक्शन के साथ दिखाया जा रहा था। नई हीरोइनों के मटकते बम और हीरो का दम देख कर हम उलझन में पड़ गए। हम तो बम का कुछ और मतलब समझते थे, यहां कुछ और है! नए गानों के बोल याद नहीं रहते। हां, एक्शन जरूर कुछ दिन तक याद रहते हैं। कहने के अंदाज में फ़र्क होता है यह बात समझ में आ गई। वे बम में है दम.. कहते हैं, हम बनारसी इसी बात को सीधे तरीके से कहते हैं। हम कहते हैं तो गाली कहलाती है, फिलिम वाले कहते हैं तो गीत का मधुर अंतरा होता है!!!

अब इससे ज्यादा चैनल हम से देखा न गया। पचाने की भी एक सीमा होती है। शुभरात्रि।

6.5.18

अभागन की शादी

किशन लाल परेशान थे। हों भी क्यों न? बेटी जवान हो चुकी और अभी तक शादी के लिए योग्य तो क्या अयोग्य वर भी नहीं मिला! बेटी पढ़ी लिखी, खूबसूरत थी मगर हाय! दोनों पैरों से अपाहिज ही बड़ी हुई थी अभागन। लड़के की तलाश में रिश्तेदारों, परिचितों के दरवाजे-दरवाजे माथा टेकते कई दिन बीत चुके थे। आज का मोबाइल और नेट का जमाना होता तो शायद इतना व्यर्थ न दौड़ना पड़ता। सब इनकार ऑन लाइन ही मिल जाता। कोई सकारता तो चल जाते उसके घर।

सब ओर से निराश हो अपने गांव लौट जाने की सोच रहे थे किशन लाल। भोर का समय था और राधे चाय वाले ने पहली केतली धरी ही थी आंच पर। भट्टी से अभी धुंआ निकल रहा था। चाय देखी तो पीने की चाह में रुक गए। जय रम्मी के बाद राधे ने बेंच पर बैठने का इशारा क्या किया, थच्च से बैठ कर अपना दुखड़ा रोने लगे। चाय पीते-पीते जैसे ही उन्होंने अपना वाक्य पूरा किया…अब कौन करेगा अभागन से शादी? वहीं पास खड़ा हो, नीम के दातून से दांत रगड़ रहा एक युवक पास आया और झुक कर चरण छूने के बाद बोला.. बाऊजी! मैं करूंगा आपकी बेटी से शादी! मैं बहुत देर से आपकी बातें सुन रहा हूं। आप ही के जाति बिरादरी का हूं। आपको अपने गांव में कोई परेशानी नहीं होगी। सेना में सैनिक हूं। आज ही डयूटी ज्वाइन करने का आदेश है। इसलिए अभी तो नहीं लेकिन आज से 6 माह बाद इस तारीख को मैं अपने पूरे परिवार और मित्रों के साथ आपके घर आऊंगा। आप शादी की तैयारी शुरू कीजिए! इतना कह कर उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना लड़का मोटर सायकिल स्टार्ट कर वहां से चला गया।

किशन लाल को लगा किसी ने उसके साथ बड़ा भद्दा मजाक किया है! मैं ही पागल हूं जो हर जगह अपना दुखड़ा सुनाता रहता हूं। राधे चाय वाले ने किशन लाल को समझाने का खूब प्रयास किया कि मैं लड़के को जानता हूं। पास ही के गांव का है। सेना में मेजर है, कहा है तो आएगा लेकिन किशन लाल को यकीन नहीं हुआ। बिना लड़की देखे, मेरे बारे में जाने, दहेज की बात किए कैसे कोई अपाहिज लड़की से शादी करने को तैयार हो जाएगा? लड़के ने मेरे साथ बड़ा भद्दा मजाक किया है। रोते कोसते किशन लाल चाय की दुकान से भारी मन लिए बड़बड़ाते लौट गए.. लड़के ने मेरे साथ...।

अपने गांव/घर आ कर भी किशन लाल कई दिनों तक बेसूध से घूमते नजर आते। अब इत्ती बेइज्जती की बात किससे कहें? क्या विश्वास करें और क्या तैयारी करें? बिटिया तो पहले से ही कहती है कि उसे किसी से शादी नहीं करनी। मास्टरनी बन जाऊंगी और ढेर सारे बच्चों को पढ़ाऊंगी।

कहे भी तो किससे कहे? अंत में कई दिनों बात उनके मन का लावा शर्मा नाऊ के पीढ़े पर बैठे दाढ़ी बनाते समय निकल ही गया! सब बात बता कर किशन लाल बोले... यह यकीन करने की बात है? छोरे ने मेरे साथ बड़ा भद्दा मज़ाक किया है। शर्मा नाऊ ने हंसते हुए कहा.. क्या जाने तुम पर भगवान को दया आ गई हो और भेज दिया हो किसी को तुम्हारी भलाई करने! तारीख याद रखियो, कहीं सच में आ गया तो का करोगे? वैसे लड़का देखने में कैसा था? किशन लाल को लगा शर्मा भी मेरा मजाक उड़ा रहा है। है ही ऐसी बात कि सभी मजाक उड़ाएंगे। इत्ते दिनों से दिल में जब्त था, नाहक मुख से फिसल गया।

इधर शर्मा नाऊ को अपने ग्राहकों को सुनाने के लिए नया मसाला मिल गया! धीरे धीरे कुछ ही दिनों में किशन लाल की छोड़, पूरा गांव जान गया कि किशन लाल के घर फलां दिवस बारात आने वाली है।

निर्धारित तिथि पर सच में आ गई बारात! गांव में हल्ला मच गया..बारात आ गई, किशन लाल के घर बारात आ गई। पगला सो चुका होगा खा पी कर। उसे जगाओ। बिटिया को सजाओ। शादी का मंडप तैयार करो। आग लगाओ, भट्टी सुलगाओ और देखते ही देखते पूरे गांव ने बारात को हाथों हाथ ले लिया। मंडप सजा, पण्डित आए.. बारात किशन लाल के घर तक तभी पहुंच पाई जब सारी तैयारी पूरी हो गई।

वर्षों बाद लड़के के गांव के पास राधे चाय की दुकान पर चर्चा होती है...

इस गांव में जब पहली बार आईं, वैशाखी पर आईं । अब तो आप देख ही रहे थे, कैसे आराम से कार चला कर जा रही थीं प्रिंसिपल मैडम? पीछे वाली सीट पर उनके दो बेटे थे और बगल में मेजर साहब। कित्ते सुंदर बच्चे थे न?

30.4.18

लोहे का घर -42

आज बनारस से छपरा रूट वाले लोहे के घर में बैठे हैं। सद्भावना सही समय पर चल रही है। इस रूट में भीख मांगने वाले बहुत मिलते हैं। अभी औड़िहार नहीं आया और चार भिखारी एक एक कर आ चुके। एक दोनों हाथ से लूला था, दूसरा रोनी सूरत लिए लंगड़ा कर चल रहा था, तीसरा अंधा था और चौथी एक महिला थी जिसके गोद में बच्चा था। मैंने किसी को कुछ नहीं दिया। जैसे रोज रोज समाचार देख/पढ़ कर व्यक्ति कठुआ जा रहा है वैसे रोज रोज के रेल सफर ने मुझे निर्मोही बना दिया है। अंधे लूले भिखारी को देख कर भी दया नहीं आती। लगता है कोई गिरोह है जो इनसे यह काम करा रहा है।
(पांचवी अंधी प्रौढ़ भिखारिन पूरे राग से भीख मांगते हुए गुजरी। उसके साथ अल्मूनियम का कटोरा पकड़े १० वर्षीय अबोध बालिका थी।)
कल युग ने कलियुग जल्दी ला दिया। आम आदमी के लिए महानगरों में अपने भी अजनबी की तरह कन्नी काट जाते हैं, छोटे शहरों में अजनबी भी ऐसे मिलते हैं जैसे पुरानी जान पहचान हो। शायद यही कारण है कि बड़े शहरों की तुलना में छोटे शहर मुझे अधिक अच्छे लगने लगे हैं। लोहे के घर में बैठते ही गाजीपुर, बलिया, छपरा के लोग बड़े प्रेम से घुलमिल जाते हैं। बोली मीठी और मीठी होती चली जाती है।
पकौड़ा स्टेशन (औड़िहार) आया और चला गया। यात्री बड़े चाव से पकौड़ी खा रहे हैं। इस ओर के यात्री भी जानते हैं कि यहां पकौड़ा मिलता है और पकौड़ी बेचने वाले भी जानते हैं कि चाहे बेसन में आटा मिलाकर खिला दो, लोग खरीदेंगे जरूर।
इधर खेतों के वही दृश्य हैं जो बनारस जौनपुर मार्ग के हैं। कहीं खेत साफ हो चुके हैं तो कहीं गेहूं के ढेर के ढेर रखे हुए हैं। कहीं कहीं कटाई भी नहीं हुई है। धूप तेज है। कभी घने वृक्ष की छांह पकड़े डोरी से बंधे चौपाए दिख जाते हैं।
इस रूट में लोकल वेंडर भी खूब चढ़ते हैं। कोई चना भूजा चटनी बेच रहा है, कोई आइस्क्रीम बेच रहा है, कोई पानी बेच रहा है तो कोई लठ्ठा नमकीन। बारी-बारी से वेंडर भांति-भांति की आवाजें निकालते हुए आ जा रहे हैं। ताली पीटने वालों का दल भी गुजर चुका। अभी तक ट्रेन किसी क्रासिंग की वजह से नहीं रुकी, चलती चली जा रही है। गाजीपुर आ गया।
एक भीड़ का छोटा सा रेला चढ़ा है। किसी के पास रिजर्व बर्थ नहीं है। सभी साधिकार एक दूसरे को घिसका कर बैठ रहे हैं। थोड़ी देर की किच किच है, कोई लफड़ा नहीं है। सभी समायोजित हो गए। घर ने नए सदस्यों को अपना लिया। कुछ देर बाद आपस में बातें होंगी। अभी चढ़ी महिला की गोदी से उतर एक बच्चा अपने पापा से उनके मोबाइल के लिए छइला रहा है। पापा से मोबाइल छीन कर उन्हीं की गोदी में बैठ गेम खेल रहा है। पापा खिसिया रहे हैं.."साला आइसन मोबाइल आ गइल बा नू...!"
गाजीपुर से चली है ट्रेन। नए वेंडर और नए गले के नए सुर... समोसा गरम ताजा गरम खाइए भाई! गरम नहीं, पैसा नहीं। चssइया! चाय चाय। चाय पियो। ओए! ककरी। दस में दू गो। अलग अलग वेंडर, अलग अलग आवाजें। इन आवाजों के बीच किसी बच्चे के रोने की आवाज। एक बात नोटिस कर रहा हूं। अभी तक कहीं से कोई राजनैतिक बहस नहीं सुनाई पड़ी। देश की चिंता में कोई दुबला नहीं हो रहा है। सभी आम आदमी हैं, अपनी अपनी चिंता में डूबे हुए। 
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एक लड़की एक रजिस्टर लेकर चल रही है लोहे के घर में। बोल रही है..."मेरे पापा को लकवा मार दिया है, सिर्फ दो चार रुपया दे दो।" और कोई दया नहीं कर रहा, मै भी नहीं।
एक महिला एक जवान लड़की के साथ चलती है। कहती है..."बिटिया की शादी करनी है, दो चार रुपया दे दो।" और कोई दया नहीं कर रहा, मै भी नहीं।
एक अंधी भिखारिन एक मासूम लड़की के साथ पूरे राग से भीख मांगते हुए जा रही है। कटोरा बिटिया के हाथ में है। कोई दया नहीं कर रहा, मैं भी नहीं।
कितना निर्दयी समय है! कोई दुखियों पर दया नहीं करता, मैं भी नहीं।
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बाप का नया चप्पल पहन कर लड़का लोहे के घर के गेट में बैठा था। कुछ देर बाद मुंह बनाकर आया..
पापा!
का है बे?

एक चप्पल गिर गया! 

तब हम का करें? नंगे पैर चलना धूप में।
मेरा नहीं, आपका।
मेरा!!! मेरा नया चप्पल पहन कर गेट में क्यों बैठा था बे? बुड़बक साला। सात सौ में खरीदे थे। अब हम इसका क्या करें?(चप्पल हाथ में उठा कर।) रुको! बताते हैं। .और लड़का दूसरी बोगी में भाग गया।
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लोहे का घर-41


#फिफ्टी_डाउन दो घंटे लेट है। #ट्रेन हो या महबूबा, लेट होना मिलन का शुभ संकेत है। हम टाइम से पहुंच नहीं सकते, वो टाइम पर आ गई तो हमारे लिए रुक नहीं सकती। सीटी बजाएगी और चल देगी। पकड़ना, चढ़ना और बैठ कर उखड़ती सांसों को ठीक करना हमारा काम है। कुछ तो चढ़ते ही बर्थ पकड़ कर लेट जाते हैं, कुछ पकड़ कर इतने भाव विभोर हो जाते हैं कि अब जाएगी कहां!
ट्रेन हवा से बातें कर रही है। खिड़कियों से आ रहे पवन के हर झोंके में चैत की खुशबू है। लोग सफ़र में थक जाते हैं, हमें सफ़र ही तरोताज किए है। जलाल गंज पुल से गुजरते हुए एक शोर उठा और सई नदी की आवाज बन ठंडी हवा के झोंके #आई_लव_यू बोल गए। हमने मन ही मन #थैंक्स कहा और मुस्कुरा दिया।
खालिसपुर में रुक कर फिर चल दी ट्रेन। कुछ आशिक चढ़े, कुछ उतर गए। नए वेंडर फिर शोर करते हुए आने/जाने लगे। दूर जाने वाले इत्मीनान की और नजदीक के यात्री चौकन्नी नींद ले रहे हैं। आस पास का माहौल ठंडा ठंडा है। एक बच्चा अभी दौड़ कर आगे गया है और उसकी मां यशोदा मैय्या की तरह पीछे पीछे भागी हैं। कल की तरह रास लीला करता कोई किसन कन्हैया नहीं है। पंजाब से आ रही है ट्रेन मगर अपने आस पास कोई पंजाबी परिवार नहीं है।
ये चाय बेचने वाले अजीब अजीब आवाज निकाल कर लोगों को आकर्षित करने और चाय के नाम पर गरम पानी पिलाने में बड़े माहिर होते हैं! अब आप इसका कोई और मतलब न निकालें प्लीज। सच लिखना वाकई बड़ा रिश्की काम है।
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ट्रेन में चढ़ो तो खुद को रेलवे को समर्पित कर दो। टाइम टेबल पर जरा भी ध्यान न दो। कब चढ़े, कितनी दूरी है, कब पहुंचेंगे जैसे प्रश्नों को मन में आने ही न दो। ट्रेन में चढ़ते ही यूं समझ लो कि अब आप कोमा में हैं। कब निकलेंगे? यह स्टेशन मास्टर भी नहीं जानता।
आप को रोक कर माल गाड़ी को आगे बढ़ाया जा सकता है। आप प्लेटफॉर्म पर ठगे से खड़े हो, मालगाड़ी को इधर से उधर, उधर से इधर आते/जाते देखते रहो। चिठ्ठी आती है, चिठ्ठी जाती है कि तर्ज पर आप कोई पैरोडी बना कर गा सकते हैं.. मालगाड़ी आती है, मालगाड़ी जाती है, अपनी वाली की बारी कभी नहीं आती है।
मित्रों को सलाह दिया जाता है कि भारतीय रेल के समय सारिणी के भरोसे घूमने का कोई प्रोग्राम न बनाएं। यात्रा तभी करें जब कोई मज़बूरी हो। प्रोग्राम बनाना जरूरी हो तो एक ट्रेन से दूसरी ट्रेन के बीच कम से कम चौबीस घंटे का फासला बना कर सीट रिजर्व कराएं। नहीं तो पता चला जब तक आप पहुंचेंगे, तब तक लौटने वाली ट्रेन छूट चुकी होगी।
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दून में रामनवमी मना कर लौट रहे यात्रियों के कारण भीड़ अधिक है। इस भीड़ में भी चार युवक दिलचस्प ढंग से सामने साइड अपर पर बैठ कर तास खेल रहे हैं। तीन खिलाड़ी साइड अपर बर्थ पर बैठे हैं और चौथा ठीक सामने वाली अपर बर्थ के एक कोने में अपना पिछवाड़ा टिकाए, साइड अपर पर अपनी दोनों टांगे जमाए पत्ते फेंक रहा है।
मेरे बगल के साइड अपर में धोती कुर्ता पहने एक बुजुर्ग इत्मीनान से सो रहे हैं। मेरे सामने के अपर बर्थ में दूसरे धोती कुर्ता वाले बुजुर्ग सो रहे हैं। इनकी बन्द पलकों के ऊपर चश्मा चढ़ा है जो ललाट की तरफ कुछ अधिक झुका है। लंबी नाक के नीचे घनी सफेद मूछें हैं। मूंछें काली होतीं तो नत्थू लाल के जैसी होती। घुटने तक धोती है और पैर के नीचे खुले मुंह वाला फटा बैग है। फटे बैग के भीतर से कुछ कपड़े बाहर झांकना चाहते हैं। ट्रेन के बदले बस होती तो उछल कर सभी नीचे गिर जाते। लोहे के घर में आम आदमी की गाड़ी ऐसे ही पटरी पर चलती रहती है और इज्जत ढकी रहती है।
साइड अपर के नीचे लोअर बर्थ पर जिसकी बर्थ है वह लेटा हुआ है और बाकी तीन लोग जिनके पास अपनी बर्थ नहीं है, मुश्किल से बैठे हुए हैं। तीनों के हाथों में मोबाइल है और तीनों अपने अपने धंधे में लगे हुए हैं। इन्हें देख ऐसा लग रहा है जैसे तीनों बहुत पढ़ने वाले बच्चे हों और गुरु जी ने कोई कठिन होम वर्क दिया हो!
मेरे सामने खिड़की वाली बर्थ पर एक प्रौढ़ बंगाली महिला अपने मोबाइल से देख देख एक कागज पर कुछ उतार रही हैं। इससे पहले बहुत देर तक मोबाइल में किसी से बहस कर रही थीं। उनके सामने यानी मेरे बगल में एक बंगाली जोड़ा अपने चेहरे पर गंभीरता ओढ़े बैठा है। पत्नी कभी कभार मुस्कुरा कर कुछ बोलती भी है तो पति आंखों के इशारे से ऐसे घूरता है कि उसे हर समय हंसना नहीं चाहिए। यह परिवार हरिद्वार से आ रहा है और हावड़ा जा रहा है। मेरे बनारस रुक कर घूमने की सलाह पर पत्नी तो खुश होकर मुस्कुरा दी मगर पती देव ने फिर आंखें तरेरीं! ये मध्यम वर्ग के पती देव टाइप लोग जब अपनी पत्नी के साथ सफ़र करते करते हैं तो थोड़े अधिक शंकालू, थोड़े अधिक बेचैन हो जाते हैं। कुछ लोग समझते हैं कि पत्नी को अपने सर पर भारी बोझ की तरह लादे संभल संभल कर चल रहे हैं। पत्नी जरा सा मुस्कुराई तो बैलेंस बिगड़ जाएगा और गृहस्थी की गाड़ी धड़ाम से गिर जाएगी।
सामने खिड़की के पास बैठी अकेली महिला अधिक आत्म निर्भर और खुश दिखाई पड़ रही हैं। इन्होंने अब खाना मंगा लिया है और वेंडर से बहस करने के बाद पूरे एक सौ तीस रुपए का भुगतान किया है। वेंडर ने जब समझाया कि दाल भात, रोटी सब्जी के साथ दो डिम भी है तब जाकर शांत हुईं। अब सामने निकले तख्ते को खींच कर उसमे खाना खोल कर सजा लिया है और एक एक कौर इत्मीनान से खाए जा रही हैं। भोजन के बाद उन्होंने फिर लिखना शुरू किया! मैंने मोबाइल से देख कर कागज पर लिखने का कारण पूछा.. क्या आप कहीं पढ़ाती हैं? महिला ने बंगाली में उत्तर दिया.. पढ़ाती नहीं हूं, पढ़ रही हूं! मेरे पती की मृत्यु हो चुकी है। मुझे कम्प्यूटर नहीं आता। मैं यह सीख लुंगी तो नौकरी मिल जाएगी! उसने मुझसे कहा है.. कम्प्यूटर सीख कर आओ तो नौकरी दे देंगे! आह! हंसते चेहरे के पीछे जमाने का दर्द और अनवरत चल रहे संघर्ष की पूरी कहानी है!!!
ट्रेन देर से एक स्टेशन पर रुकी है। अपर बर्थ पर बुजुर्ग वैसे ही सो रहे हैं। एक ने करवट बदला है और दूसरे की धोती कुछ और खुल गई है। तास खेलने वाले लेट चुके हैं और मोबाइल हाथ में लिए होमवर्क कर रहे यात्रियों में से एक ने शायद अपना सबक पूरा कर लिया है शेष दो वैसे ही मोबाइल में भिड़े हुए हैं।
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सरसों कट चुके। खेतों में खड़े थे तो फूलों को देख मन कितना हर्षित होता था! अब उनके ठूंठ के ढेर पड़े हैं। अब गेहूं की बालियां लहलहा रही हैं। ये भी कटेंगी एक दिन। जीवन का सब सौंदर्य जीवन के साथ रीत जाता है। शेष बचता है तो राख, मिट्टी, भूसा या फिर जलावन।
सूरज ढल रहा है। रोज उगना और ढलना इसकी नियति लगती है लेकिन विज्ञान कहता है न सूरज उगता न ढलता है। यह पृथ्वी है जो सूरज के चक्कर लगाती है। दृश्य और सत्य में कितना फर्क होता है! मृत्यु एक बार आती है, मृत्यु का भय जीवन भर डराता है। जिस दुख से जीवन भर भागते फिरते हैं, वही मृत्यु दुखों से निजात दिलाती है।
लोहे के घर में सूप लेकर भीख मांगने वाली भी आई है, ताली बजाकर रंगदारी वसूलने वाले छक्के भी चढ़े हैं। एक मांगने वाला दूसरे मांगने वाले को हिकारत की नजरों से देखता है। एक ही धंधे में लगे लोगों में आपस में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा होती है फिर चाहे लोहे के घर में पैसे मांगने वाले भिखारी हों, स्वर्ग की सीढ़ी चढ़ाने वाले मन्दिर के पुजारी हों या जनता से वोट मांगने वाले नेता। सभी एक दूसरे को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हुए अनैतिकता के पक्ष में तर्क देते हुए दिखते हैं।
सरसों के ठूंठ को देख एक प्रश्न तो उठता है मन में..इतने हाहाकरी के बाद जी रहे जीवन का हासिल क्या है? क्यों न जब तक जीयें सरसों के फूलों की तरह हंसते रहें और जब झरें, किसी चूल्हे की आंच बने। शायद मनुष्य की किस्मत में विधाता ने यह सौभाग्य नहीं लिखा। बहुत पुण्य किया तो लोगों ने उसकी मूर्ति बना दी। मूर्तियों का हाल तो आप देख ही रहे हैं।
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अपने मार्ग की ट्रेने लेट चल रही हैं आजकल। पटरियों में विकास दौड़ रहा है। किसी स्टेशन पर कोई स्टेशन मास्टर यह बताने की स्थिति में नहीं रहता कि अमुक ट्रेन कब आएगी और कब चलेगी। पूछो तो एक ही जवाब सुनने को मिलता है... कंट्रोलर जाने। कंट्रोलर कई सौ किमी दूर बैठता है। हर स्टेशन मास्टर को अपने कमरे के बाहर लिखवा के टांग देना चाहिए कि ट्रेन कब आएगी यह ऊपर वाला जाने। हानी,लाभ,जीवन,मरण, यश, अपयश हरि हाथ।
रेलवे ने हर श्रेणी के यात्रियों के लिए बाथरूम युक्त इतना बड़ा प्रतीक्षालय क्यों बनवाया है? प्रतीक्षा करने के लिए। ट्रेनें लेट न हों तो स्टेशन और स्टेशन के बाहर पकौड़े वालों को रोजगार आखिर कैसे मिलेगा? चाय की दुकान आखिर कैसे चलेगी? रेलवे भले खुद रोजगार न दे पाए रोजगार का सृजन तो कर ही रहा है। अब तो फ्री वाई फाई की सुविधा भी उपलब्ध है। नहाइए, धोइए, चाय पीजिए, पकौड़े खाइए और आराम आराम से फिलिम देखिए। रेलवे आपकी सुविधा का कितना ख्याल रखता है। ट्रेन चौबीस घंटे लेट हो जाए मगर आपसे कोई अतिरिक्त किराया वसूल नहीं करता। समय से घर जा कर ही क्या पहाड़ धकेल लेंगे? टीवी में समाचार सुनेंगे, फेसबुक/ वाट्सएप चलाएंगे या मोबाइल में कोई गेम खेलेंगे। ये सब काम तो लोहे के घर में भी हो सकता है।
जिन्हें मोबाइल चलाने नहीं आता उनकी जिंदगी बड़ी दुखदाई है। ट्रेन लेट होने पर लोहे के घर में बैठे वृद्ध यात्री इतनी रोनी सूरत बनाकर करवटें बदलते हैं कि क्या कहें! उन्हें यह नहीं पता होता कि तीस किमी दो घंटे में आई। ये तो बस यह जानते हैं कि दिन में घर पहुंच जाना था, अब तो रात हो गई!
मेरे सामने वाली बर्थ पर दो मध्यम वर्गीय परिवार की प्रौढ़ महिलाएं सोई हुई हैं। दुबली पतली हैं तो एक ही बर्थ पर एडजस्ट हो गईं। मध्यम वर्गीय वैसे भी परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने में माहिर होते हैं। महिलाएं लेटने से पहले बैठी थीं। बैठते बैठते बोर हो गईं तो लेट गईं। लेटे लेटे गहरी नींद में चली गईं। गहरी नींद में जाने से पहले कई बार करवटें बदल रही थीं। अब फाइनली गहरी नींद में हैं। क्या आपने कभी पानी से निकली हुई दो जिंदा मछलियों को तड़फते और तड़प तड़प कर शांत होते देखा है? मुझे न जाने क्यों बीच में मछलियों के तड़पने की याद हो आई।
मेरे बगल में वृद्ध आदमी बैठे हैं। ये प्रौढ़ महिलाओं के साथ हैं। सभी वृद्ध ट्रेन की धीमी चाल की चर्चा कर रहे हैं। जाहिर है लेट होने से दुखी हैं। ये सभी लंबी टूर पर हैं। हरिद्वार से चले हैं, बनारस में रुकेंगे और गया भी जाएंगे। आसाम के सीधे साधे साहसी यात्री हैं। सिंदबाद के समय भी साहसिक यात्राएं होती थीं, आज तो भारतीय रेल और बड़े बड़े प्रतीक्षालय हैं। यात्रा करना सभी के लिए सरल हो गया है। न जाने क्यों आजकल ट्रेन में यात्रा करते समय सिंदबाद की साहसिक यात्राओं का स्मरण हो जाता है!
#ट्रेन जलाल गंज में देर से रुकी है। जौनपुर आने में जब ६ किमी रह गया था और आने का समय नेट में 5.49 दिखा रहा था मैं स्टेशन के लिए चला था। 6 किमी आने में इसे एक घंटा लगा और अब तक २० किमी 1.30 घंटे में पहुंची है। अभी ४० किमी और जाना है। इस हिसाब से ६० किमी चलने में लगभग ५ घंटे लगने वाले हैं। ऐसा नहीं कि इसी ट्रेन का यह हाल है। यह देहरादून एक्सप्रेस है। इसके आगे भी ट्रेन खड़ी है, पीछे भी ट्रेन खड़ी है। पटरियों पर ट्रेनें चीटियों की तरह पंक्तिबद्ध हो चल रही हैं। आगे वाली चींटी रुकती है तो पीछे वाली भी रुक जाती है। कब पहुंचेगी यह ऊपर वाला जाने।
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आज लोहे के घर का मौसम कम्माल का है! गोदिया में लेटा हूं, खिड़की से आ रही है शिमला की ठंडी हवा और खिडकी के बाहर चौदहवीं का चांद पूरे शबाब पर है! लेट कर खिड़की से आकाश में झांको तो दूर ऊपर अपनी समस्त चन्द्र कलाओं के साथ मुस्कुरा रहा है चांद।
अंधेरे में डूबी है पूरी बोगी। अधिक रात हो चुकी है, सभी सो रहे हैं अपनी बर्थ पर। भीतर अंधेरा है, बाहर बिखरी है चांदनी। अभी गोमती के पुल से गुजरी है ट्रेन। चांदनी में नहा रही थी नदी। एक भी लहरें नहीं उठीं। कोई तरंग भी नहीं। झिलमिल चांदनी के पद चिन्ह दिखे। मछलियां और गहरे उतर गई होंगी कहीं तलहटी में।
आहा! क्या मस्त ठंडी ठंडी हवा बह रही है। ठंडी हवा के झोंके हल्के हल्के नहीं हैं, तेज तेज हैं। झोंके कभी हल्के हो ही नहीं सकते। जो हल्के होते हैं वे झोंके नहीं हो सकते। पंकज उधास ने जो ग़ज़ल गाई, न जाने कैसे उसके झोंके हल्के हल्के थे!
चांद गुम हो गया! अभी खिड़की से बाहर झांका तो देखा ट्रेन की छत के ऊपर छुप गया। कोई सुंदरी छुप जाती हो जैसे दरवज्जे के ओट में। सुनती रहती हो पर्दे के पीछे खड़ी खड़ी सभी बातें! वैसे ही गुम हो गया चांद! पटरियों पर उछल उछल हवा से बातें कर रही है #ट्रेन। सूरज न दिखे, धूप दिखे जैसे! चांद छुप गया, चांदनी दिख रही है अभी।
किसी छोटे स्टेशन पर ट्रेन जब पटरियां बदलते हुए तेज रफ्तार से भागती है तो लगता है झूला झुला रही है। ठंडी हवा के झोंके, चौदहवीं का चांद और झूला झुलाती हुई अपनी गोदिया। मंजिल की चाह तो होती है मगर सफ़र में जो आनंद है वह मंजिल में कहां! 
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वही लोहे का घर, वही मौसम, वही बर्थ और सामने वही चौदहवीं का चांद बस समय थोड़ा पहले। आज समय थोड़ा पहले है, शायद इसीलिए चांद एकदम सामने है। इतना साफ है कि उसके दाग भी दिख रहे हैं! ठंडी हवा के झोंके आज भी हैं। आज गोदिया नहीं, कोटा पटना है लेकिन है तो लोहे का घर ही।
लेटे लेटे लोहे के घर की खिड़की से देखते रहो चांद को तो जब खिड़की का राड आ जाता है बीच में चांद दो भाग में बटा नहीं दिखता, दो हो जाता है! ऐसा लगता है जैसे दर्पण में खुद को देख रहा है!!! कभी रबड़ सा खींच कर फैल जाता है नीले आकाश में चार अंगुल लंबा, कभी छुप जाता है पल भर के लिए किसी घने वृक्ष के पीछे। ये चांद की शोख अदाएं हैं या मेरी निगाहों का भरम!
ट्रेन दौड़ रही है पटरी पर, ठंडी हवा के झोंके करा रहे हैं एहसास कि हम चल रहे हैं मगर चांद जहां का तहां! काश! हम दौड़ते न रहते पटरियों पर। पंख होते और उड़ कर पहुंच जाते चांद के पास। पोत देते चांद के धब्बों में कोई क्रीम और फिर चुपके से आ कर लेट जाते लोहे के घर के इसी बर्थ पर। तब आइने में अपनी शकल देख पूरा चक्कर में पड़ जाता चांद।
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क्षणिकाएँ

(1)

झूठ 
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दिल का
थोड़ा थोड़ा 
टूटना
मन का
थोड़ा थोड़ा 
गिरना
जिस्म को
थोड़ा थोड़ा
मारता है
लोग झूठ बोलते हैं
वो
अचानक चला गया।

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(2)

अंतिम स्टेशन
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हे ईश्वर!
रेलवे का गार्ड
हर स्टेशन पर
ट्रेन को हरी झंडी दिखाता है 
तू मुझे दिखा!
बचपन,
जवानी तो ठीक था
आगे
बुढ़ापा है।

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(३)
सत्य
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मानते, चीखते
सत्य बोल, गत्य है
घर से मरघट तक,
राम नाम सत्य है।
आदमी है मगर
भूख से नंगा है।
रात गई, बात गई।
काम है, धंधा है।
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(४)
डूब गया सूरज
..…..............
खुली थी
लोहे के घर की खड़की
दूर घने वृक्षों की फुनगियों के ऊपर
गेंद की तरह उछलता
डूब रहा था
सूरज
गोमती आई
तो लगा
नहाएगा डूब कर
मगर नदी में
अपनी परछाईं देख
भाग गया!
छू भी नहीं पाए उसे
ईंट भट्टे की ऊंची चिमनी से भख-भख निकलने वाले धुएं
हल्की और हल्की होने लगी
सुनहरी छाप
मिमियाते हुए
खेत की मेड़ पर बैठे
दद्दू के पास
भाग-भाग आने लगी
बकरियां
चमक खोने लगे
गेहूं के खेत
अंधेरे की चादर ओढ़
आराम के मूड में
आने लगी धरती
लंबी होने लगी
परछाइयां
ट्रेन को देख
ठिठक कर रुक गईं
घास का बोझ सर पर लादे
पगडंडी पगडंडी जा रही
वृद्ध महिलाएं
और...
देखते ही देखते
डूब गया सूरज।
....

(5)

मुर्गा
........
मुर्गे ने बांग दी
कवि की नींद खुली
नींद खुली तो
कवि ने लिखी कविता
कविता सुनकर
सबकी नींद खुली
नींद से जागे लोगों ने
पहला काम यह किया कि
नींद से जगाने के अपराध में
पंचायत बुलाई
कवि ने पाला बदला
भक्ति के गीत गाए
मुर्गे ने
अपना स्वभाव नहीं बदला
मारा गया।
आज भी
स्वभाव न बदलने के कारण
नींद से जगाने के अपराध में
मारा जाता है
मुर्गा।
....................

27.3.18

माफ़ी

हम जब छोटे थे तो कक्षा में गुरुजी और घर में बाउजी दंडाधिकारी थे। दोनों को सम्पूर्ण दंडाधिकार प्राप्त था। स्कूल में गलती किया तो मुर्गा बने, घर में गलती किया तो थप्पड़ खाए। एक बार जो कक्षा में मुर्गा बन गया, दुबारा गलती करने का विचार भी मन में आता तो उसकी रूह कांप जाती। अच्छे अच्छे शरारती और मिजाज के टेढ़े लड़के बाबूजी के घर में आने की आहट भांप कर सीधे हो जाते थे! तब गलती करने पर माँ के आँचल के अलावा दोनो जहां में कहीं माफी नहीं मिलती थी।

अब नदी में बहुत पानी बह गया। इधर गुरुजी ने लड़के को चपत भी लगाई उधर उसका पूरा खानदान स्कूल के दरवाजे पर खड़ा मिलेगा...मेरे गधे को डंडा क्यों मारा? गुरुजी देर तक गधे के पूरे खानदान से माफी मांगते नजर आएंगे….वो क्या है कि मैंने तो इसलिए लड़के को चपत लगाई कि लड़का गलत संगति में न पड़े, पढ़ लिख ले..। तब तक गधे का बाप शेर की तरह दहाड़ेगा.. चौप! जानते नहीं हो! मैनेजर से कह कर नौकरी से निकलवा दुंगा!!! अब तदर्थ या संविदा पर नियुक्त वित्तविहीन अध्यापक के पास इतनी हिम्मत कहां!  वह तो नौकरी जाने के भय से गधे को भी बाप कहेगा। 

इधर बाबूजी ने लड़के को थप्पड़ लगाया तो लड़का जोर से चीखा... मम्मी ssss और बाबूजी की सिट्टी पिट्टी गुम!  देर तक मम्मी से सॉरी सॉरी बोलते नजर आएंगे। लड़का पापा को तिरछी निगाहों से ताकेगा..हो गया?  फिर बुलाऊं मम्मी को?  

न तो पहले घरेलू हिंसा का कानून था, न मध्यम वर्गीय घरों के लड़के अंग्रेजी कान्वेंट स्कूल में पढ़ पाते थे। वह समय अभी ज्यादा दूर नहीं गया जब माफी वही मांगता था जो गलती करता था। उसे माफी नहीं मांगनी पड़ती थी जो गलत काम करने से रोकता है। 

अब ऐसे हालात में सज्जन पुरुष माफी नहीं मांगेगा तो और क्या करेगा? अपनी यह जो पीढ़ी है न? बहुत सताई हुई पीढ़ी है। जब तक बच्चे थे स्कूल में गुरुजी और घर में बाउजी तोड़ते रहे। जब बड़े हुए तो बैल मरकहे हो गए और गधों के सींग जम गए!

नेता जी के माफी मांगने से आप अधिक उत्साहित हैं तो यह आपकी भूल है। कुछ लोग गलती इसीलिए करते हैं कि फंस गए तो माफी मांग लेंगे। हमारे देश में सज्जनों और उदार हृदय वालों की कोई कमी भी नहीं। जहां देखो, वहीं दयालू गुरु मिल जाते हैं। यदि कानून का रटा रटाया निश्चित नियम कानून न होता तो क्या पता वर्षों बाद किसी घोटाले में फंसे नेता जी को जज साहेब दया कर के छोड़ ही दें! बुड्ढा बेचारा! अब कहां जाएगा जेल!  जनता का वश चले तो शायद माफी मिल ही जाय! बड़ी दयालु और सहिष्णु है भारत की जनता। नेता जी भी जनता की इस कमजोरी को ताड़ चुके हैं। जब उन्हें टीवी में हाई लाइट होने का मन करता है तड़ से ऐसा बयान जारी करते हैं कि विरोधी गुट शोर मचाने लगता है... तुमने गलती करी, बहुत बड़ी गलती करी। हमारी मान हानी हुई। तुम्हारे खिलाफ मानहानी का मुकदमा करेंगे! पानी जहां सर के ऊपर गया, नेताजी झुककर माफी मांग लेते हैं..मेरे कहने का मतलब यह नहीं था, मेरे बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया फिर भी किसी को दुःख पहुंचा हो तो हमको माफी दई दो! 

एक झटके में सबका भला हो गया। जिसकी मान हानी हुई थी व वह अब मान लाभ की स्थिति में पहुंच गया! जो नेता जी भीड़ में गुम हो चुके थे फिर से अखबार और टी वी चैनलों पर चमकने लगे। समाचार चैनलों को अच्छी खासी टी आर पी मिल गई। देश की चिंता करने वालों को फेसबुक और वाट्स एप पर बहस का नया मुद्दा मिल गया। जुगलबंदी बना कर व्यंग्य ठेलने वालों को एक नया विषय मिल गया। एक नेता जी ने गलती क्या करी मानों देश की सोई चेतना ही जाग गई!  

अब किसी को मेरी किसी बात पर कोई ठेस पहुंची हो तो .. सॉरी! माफी मांगने का यह अंग्रेजी तरीका मुझे अतिशय प्रिय है। माफी भी मांग लो और गिल्टी फील भी न हो! और इसके बाद कोई फिर कुछ कहे तो जोर से भिड़ लो..बोला न सॉरी! अब जान लोगे क्या?

25.3.18

मेरे राम

गंगा किनारे फैले बनारस की गलियों में जिसे पक्का महाल कहते हैं, प्रायः घर घर में मन्दिर है। मेरे घर में भी मन्दिर था, मेरे मित्र के घर में भी। मेरे राम काले थे। मेरे मित्र के गोरे। मेरे काले संगमरमर से बने, मित्र के सफेद संगमरमर वाले। बचपन में जब हम दोनों में झगड़ा होता तो मित्र कहता..तेरे राम काले कलूटे! हम कहते.. तेरे राम के शरीर में तो खून ही नहीं है, इसीलिए सफेद हैं। बड़े होने पर अपने झगड़े को याद कर हम खूब हंसते।

कुछ और समझ आईं तो लगा यह झगड़ा तो बड़ा व्यापक है! कबीर के राम और तुलसी के राम में भी भेद है!!! हालांकि दोनों राम को लेकर हमारी तरह आपस में झगड़े नहीं, अपने अपने ढंग से अपने अपने राम को पूजते हुए स्वर्ग सिधार गए मगर दोनों के भक्तों में झगड़ा आज भी है। दोनो के अपने अपने राम हैं! कबीर कहते.. निर्गुण राम भजहूं रेे भाई और तुलसी कहते हैं.. भए प्रकट कृपाला, दीन दयाला..। कहें चाहे जो और जैसे कहें मगर दोनों के राम हैं कृपालु। सभी पर कृपा करने वाले हैं। दोनो के भक्त अपने अपने राम से प्रेम भी खूब करते हैं।  

कुछ दुष्ट भी हैं जो राम को नहीं, रावण को अपना भगवान मानते हैं।  रावण को भगवान मानने वाले, दक्खिन में हैं और धीरे धीरे पूरी तरह दक्खिन में मिल जाएंगे। दख्खिन में मिलने से पहले कृपालु राम उनको बुद्धि दे दें तो उनका भी भला हो जाय। 

बचपन के झगड़े मासूम होते हैं। मासूम झगड़े समझ आने पर खूब हंसाते हैं और आनन्द भी देते हैं। लेकिन समझदारों के झगड़े बड़े खतरनाक होते हैं। राजनीति से प्रेरित होते हैं। यहां प्रेम नहीं, अहंकार टकराता है। मजे की बात यह कि राम इस झगड़े में हस्तक्षेप भी नहीं करते। जैसी करनी तैसी भरनी वाले मूड में चुप हो बैठे रहते हैं।

मेरे पास दोनो राम हैं। काले भी, गोरे भी। तुलसी के भी, कबीर के भी। कबीर के राम मेरे मस्तिष्क में और तुलसी के राम मेरे हृदय में बसे हैं। आज मेरे दिल में बसे राम का जन्मदिन है। 

घर में राम मन्दिर था तो जाहिर है राम नवमी हमारे घर का वर्ष का सबसे बड़ा त्योहार होता था। पिताजी भारतीय जीवन बीमा निगम में मामूली क्लर्क की नौकरी करते थे मगर राम नवमी का उत्सव धूम धाम से मनाते। बनारस की गलियों में स्थित तीन मंजिला पुराना जरजर मकान था जिसकी गली वाली दीवाल मेरे होश संभालने के समय से ही गली की तरफ इतनी झुकी हुई थी कि बरसात के दिनों में लोग इस गली से जल्दी निकल भागना चाहते थे कि कहीं मकान भरभरा के गिर न पड़े और उसी में दब कर मर जाएं! यह अलग बात है कि राम की कृपा से पिताजी गुजर गए लेकिन मकान कभी नहीं गिरा। 

राम नवमी आने से पहले घर में हर वर्ष काम लग जाता। हमारे कंचे खेलने से छत पर बने गढ्ढे हों या बगल के मकान से सटी दीवार के छिद्र सब भर जाते। पूरे घर में नील डाल कर चूने की पोताई होती। मन्दिर के सीलन भरे दीवार चमकने लगते। भगवान राम का पूरा परिवार नए वस्त्र पहन कर सुंदर दिखता। हम बच्चों को नए कपड़े तो नहीं मिलते पर राम, लक्ष्मण, जानकी और माता दुर्गा की प्रतिमा के लिए नए कपड़े जरूर बनते। बजरंगबली केसरिया पोतकर अलग दमकते रहते। सांवरे राम को सजाने के लिए अशोक के पत्ते, फूल मालाएं और बड़ी बड़ी नई आंखें लाई जातीं। जिस मन्दिर में रोज जीरो वॉट का प्रकाश रहता उस मन्दिर में सौ वॉट के बल्ब और झालरें दम दम चम चम दमकते/चमकते रहते। ऊपर प्रसाद बनता नीचे दुर्गा सप्तशती पाठ के बाद भगवान राम की पूजा होती। इधर घड़ी की सूइयां १२ बजाती, उधर भए प्रकट कृपाला दीन दयाला...शुरू। 

हमेशा बन्द रहने वाले घर के दरवाजे भक्तों के दर्शन के लिए खोल दिए जाते। दिन भर भजन कीर्तन चलता रहता। हारमोनियम, तबला, बैंजो और बांसुरी पर हर उम्र के लड़के हाथ आजमाते। देर रात तक भजन कीर्तन चलता। मजे की बात यह कि यह कहानी केवल हमारे घर की हो ऐसा नहीं है। बनारस के पक्के महाल की गलियों में कई राम मन्दिर हैं। अपने घर का प्रसाद मिलने के बाद हम बच्चे गोल बनाकर गली के सभी मंदिरों में प्रसाद पाने के लालच में घूम घूम कर दर्शन करते। दर्शन के बाद मन्दिर के पुजारी के आगे बढ़े हुए दाहिने हाथ की अंजुरी को नीचे से बाएं हाथ की अंजुरी सहारा देती। अंजुरी में एक चम्मच चरणामृत गिरता और गप्प से मुंह के अंदर। सचमुच अमृत की तरह मीठा होता था चरणामृत का स्वाद! 

मेरा भगवान राम से प्रथम मिलन कब हुआ यह मैं नहीं बता सकता। जैसे कोई बच्चा कैसे बताएगा कि उसने अपने पिताजी को कब देखा? मां को कब देखा? बड़े भाई या बड़ी बहन को कब देखा? वैसे ही मैं यह नहीं बता सकता कि भगवान राम से पहली बार कब मिला! मेरे घर ही राम मन्दिर था और राम मेरे घर के ही सदस्य थे। बिना राम को नहलाए, कपड़े पहनाए, भोजन कराए कोई घर में भोजन कर ही नहीं सकता था। अब कैसे कहें कि मन्दिर की मूर्तियां निर्जीव थीं! घर के किसी सदस्य का कोई सुख ऐसा नहीं होगा जिसमें सबसे पहले राम को भोग न लगा हो। कोई दुःख ऐसा न होगा जो राम को पता न चला हो। आंसू की बूंदें छलकी होंगी तो सबसे पहले प्रभु राम के चरणों में। माता पिता से जो बात न कह सके वो राम से कह दिया। कभी कोई गलत काम का विचार भी मन में आया तो मन में भय लगा रहा कि कोई देखे या न देखे राम तो देख ही लेंगे! उनको पता चल गया तब? कहने का मतलब यह कि मेरे राम तो मेरे जन्म से ही मुझसे जुड़े रहे। बचपन में भले हम सुंदर काण्ड से ज्यादा राम चरित्र मानस न पढ़े हों लेकिन मेरे राम तुलसी के राम से तनिक भी उन्नीस न थे। 

जैसा कि मध्यम वर्गीय परिवार में होता है कि जब परिवार बड़ा और कमाने वाला एक हो, मासिक आय निर्धारित हो तो मुखिया इतना मितव्ययी हो जाता है कि घर के सभी सदस्य उसे कंजूस समझने लगते हैं। जब तक अपने सर पर ओले नहीं पड़े पिताजी को भी सभी कंजूस ही समझते थे। मेरे घर के राम मंदिर में भी जीरो वॉट का एक ही बल्ब जलता था। सुबह की बात तो और थी। बगल में गंगाजी थीं तो गंगा स्नान करना, गंगाजल लाना, नहलाना आनन्द दायक काम था लेकिन शाम को मन्दिर में अगरबत्ती जलाने, नैवेद्य चढ़ाने और घंटा बजाने के लिए घर की सीढ़ियां उतरना बच्चे के लिए टेढ़ी खीर होती थी। मेरे राम काले संगमरमर के सांवले राम थे। अंधेरे में चमकतीं बड़ी-बड़ी आंखों को दूर से देखकर ही भय लगता था। यूं तो बड़े भाई लोग ही शाम की पूजा में जाते मगर यदि भैया कभी पढ़ रहे हों तो वे मुझे ही जाने का आदेश दे देते। यह तब की बात है जब मैंने स्कूल जाना शुरू भी नहीं किया था।

अंधेरे में घर की सीढ़ियां उतरना, राम जी के सामने खड़े होकर अगरबत्तियां जलाना, नैवेद्य चढ़ाना और घंटी बजाना बड़े साहस का कार्य हुआ करता था। बिना गए कह भी नहीं सकते थे की अगरबत्ती जला दिए! घर में जो जहां हो, घंटी की आवाज़ जरूर सुन रहा होता। घंटी की आवाज़ मतलब भोजन मिलने की सूचना। सीढ़ियां उतरते समय हर कदम उनको गरियाता और सीढ़ियां चढ़ते समय हर कदम उनको धमकाता कि आने दो पिताजी को...। मेरी राम से यारी बाद में हुई पहले तो मुझे उनसे बहुत भय लगता था।

जय #राम जी की।