27.3.18

माफ़ी

हम जब छोटे थे तो कक्षा में गुरुजी और घर में बाउजी दंडाधिकारी थे। दोनों को सम्पूर्ण दंडाधिकार प्राप्त था। स्कूल में गलती किया तो मुर्गा बने, घर में गलती किया तो थप्पड़ खाए। एक बार जो कक्षा में मुर्गा बन गया, दुबारा गलती करने का विचार भी मन में आता तो उसकी रूह कांप जाती। अच्छे अच्छे शरारती और मिजाज के टेढ़े लड़के बाबूजी के घर में आने की आहट भांप कर सीधे हो जाते थे! तब गलती करने पर माँ के आँचल के अलावा दोनो जहां में कहीं माफी नहीं मिलती थी।

अब नदी में बहुत पानी बह गया। इधर गुरुजी ने लड़के को चपत भी लगाई उधर उसका पूरा खानदान स्कूल के दरवाजे पर खड़ा मिलेगा...मेरे गधे को डंडा क्यों मारा? गुरुजी देर तक गधे के पूरे खानदान से माफी मांगते नजर आएंगे….वो क्या है कि मैंने तो इसलिए लड़के को चपत लगाई कि लड़का गलत संगति में न पड़े, पढ़ लिख ले..। तब तक गधे का बाप शेर की तरह दहाड़ेगा.. चौप! जानते नहीं हो! मैनेजर से कह कर नौकरी से निकलवा दुंगा!!! अब तदर्थ या संविदा पर नियुक्त वित्तविहीन अध्यापक के पास इतनी हिम्मत कहां!  वह तो नौकरी जाने के भय से गधे को भी बाप कहेगा। 

इधर बाबूजी ने लड़के को थप्पड़ लगाया तो लड़का जोर से चीखा... मम्मी ssss और बाबूजी की सिट्टी पिट्टी गुम!  देर तक मम्मी से सॉरी सॉरी बोलते नजर आएंगे। लड़का पापा को तिरछी निगाहों से ताकेगा..हो गया?  फिर बुलाऊं मम्मी को?  

न तो पहले घरेलू हिंसा का कानून था, न मध्यम वर्गीय घरों के लड़के अंग्रेजी कान्वेंट स्कूल में पढ़ पाते थे। वह समय अभी ज्यादा दूर नहीं गया जब माफी वही मांगता था जो गलती करता था। उसे माफी नहीं मांगनी पड़ती थी जो गलत काम करने से रोकता है। 

अब ऐसे हालात में सज्जन पुरुष माफी नहीं मांगेगा तो और क्या करेगा? अपनी यह जो पीढ़ी है न? बहुत सताई हुई पीढ़ी है। जब तक बच्चे थे स्कूल में गुरुजी और घर में बाउजी तोड़ते रहे। जब बड़े हुए तो बैल मरकहे हो गए और गधों के सींग जम गए!

नेता जी के माफी मांगने से आप अधिक उत्साहित हैं तो यह आपकी भूल है। कुछ लोग गलती इसीलिए करते हैं कि फंस गए तो माफी मांग लेंगे। हमारे देश में सज्जनों और उदार हृदय वालों की कोई कमी भी नहीं। जहां देखो, वहीं दयालू गुरु मिल जाते हैं। यदि कानून का रटा रटाया निश्चित नियम कानून न होता तो क्या पता वर्षों बाद किसी घोटाले में फंसे नेता जी को जज साहेब दया कर के छोड़ ही दें! बुड्ढा बेचारा! अब कहां जाएगा जेल!  जनता का वश चले तो शायद माफी मिल ही जाय! बड़ी दयालु और सहिष्णु है भारत की जनता। नेता जी भी जनता की इस कमजोरी को ताड़ चुके हैं। जब उन्हें टीवी में हाई लाइट होने का मन करता है तड़ से ऐसा बयान जारी करते हैं कि विरोधी गुट शोर मचाने लगता है... तुमने गलती करी, बहुत बड़ी गलती करी। हमारी मान हानी हुई। तुम्हारे खिलाफ मानहानी का मुकदमा करेंगे! पानी जहां सर के ऊपर गया, नेताजी झुककर माफी मांग लेते हैं..मेरे कहने का मतलब यह नहीं था, मेरे बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया फिर भी किसी को दुःख पहुंचा हो तो हमको माफी दई दो! 

एक झटके में सबका भला हो गया। जिसकी मान हानी हुई थी व वह अब मान लाभ की स्थिति में पहुंच गया! जो नेता जी भीड़ में गुम हो चुके थे फिर से अखबार और टी वी चैनलों पर चमकने लगे। समाचार चैनलों को अच्छी खासी टी आर पी मिल गई। देश की चिंता करने वालों को फेसबुक और वाट्स एप पर बहस का नया मुद्दा मिल गया। जुगलबंदी बना कर व्यंग्य ठेलने वालों को एक नया विषय मिल गया। एक नेता जी ने गलती क्या करी मानों देश की सोई चेतना ही जाग गई!  

अब किसी को मेरी किसी बात पर कोई ठेस पहुंची हो तो .. सॉरी! माफी मांगने का यह अंग्रेजी तरीका मुझे अतिशय प्रिय है। माफी भी मांग लो और गिल्टी फील भी न हो! और इसके बाद कोई फिर कुछ कहे तो जोर से भिड़ लो..बोला न सॉरी! अब जान लोगे क्या?

25.3.18

मेरे राम

गंगा किनारे फैले बनारस की गलियों में जिसे पक्का महाल कहते हैं, प्रायः घर घर में मन्दिर है। मेरे घर में भी मन्दिर था, मेरे मित्र के घर में भी। मेरे राम काले थे। मेरे मित्र के गोरे। मेरे काले संगमरमर से बने, मित्र के सफेद संगमरमर वाले। बचपन में जब हम दोनों में झगड़ा होता तो मित्र कहता..तेरे राम काले कलूटे! हम कहते.. तेरे राम के शरीर में तो खून ही नहीं है, इसीलिए सफेद हैं। बड़े होने पर अपने झगड़े को याद कर हम खूब हंसते।

कुछ और समझ आईं तो लगा यह झगड़ा तो बड़ा व्यापक है! कबीर के राम और तुलसी के राम में भी भेद है!!! हालांकि दोनों राम को लेकर हमारी तरह आपस में झगड़े नहीं, अपने अपने ढंग से अपने अपने राम को पूजते हुए स्वर्ग सिधार गए मगर दोनों के भक्तों में झगड़ा आज भी है। दोनो के अपने अपने राम हैं! कबीर कहते.. निर्गुण राम भजहूं रेे भाई और तुलसी कहते हैं.. भए प्रकट कृपाला, दीन दयाला..। कहें चाहे जो और जैसे कहें मगर दोनों के राम हैं कृपालु। सभी पर कृपा करने वाले हैं। दोनो के भक्त अपने अपने राम से प्रेम भी खूब करते हैं।  

कुछ दुष्ट भी हैं जो राम को नहीं, रावण को अपना भगवान मानते हैं।  रावण को भगवान मानने वाले, दक्खिन में हैं और धीरे धीरे पूरी तरह दक्खिन में मिल जाएंगे। दख्खिन में मिलने से पहले कृपालु राम उनको बुद्धि दे दें तो उनका भी भला हो जाय। 

बचपन के झगड़े मासूम होते हैं। मासूम झगड़े समझ आने पर खूब हंसाते हैं और आनन्द भी देते हैं। लेकिन समझदारों के झगड़े बड़े खतरनाक होते हैं। राजनीति से प्रेरित होते हैं। यहां प्रेम नहीं, अहंकार टकराता है। मजे की बात यह कि राम इस झगड़े में हस्तक्षेप भी नहीं करते। जैसी करनी तैसी भरनी वाले मूड में चुप हो बैठे रहते हैं।

मेरे पास दोनो राम हैं। काले भी, गोरे भी। तुलसी के भी, कबीर के भी। कबीर के राम मेरे मस्तिष्क में और तुलसी के राम मेरे हृदय में बसे हैं। आज मेरे दिल में बसे राम का जन्मदिन है। 

घर में राम मन्दिर था तो जाहिर है राम नवमी हमारे घर का वर्ष का सबसे बड़ा त्योहार होता था। पिताजी भारतीय जीवन बीमा निगम में मामूली क्लर्क की नौकरी करते थे मगर राम नवमी का उत्सव धूम धाम से मनाते। बनारस की गलियों में स्थित तीन मंजिला पुराना जरजर मकान था जिसकी गली वाली दीवाल मेरे होश संभालने के समय से ही गली की तरफ इतनी झुकी हुई थी कि बरसात के दिनों में लोग इस गली से जल्दी निकल भागना चाहते थे कि कहीं मकान भरभरा के गिर न पड़े और उसी में दब कर मर जाएं! यह अलग बात है कि राम की कृपा से पिताजी गुजर गए लेकिन मकान कभी नहीं गिरा। 

राम नवमी आने से पहले घर में हर वर्ष काम लग जाता। हमारे कंचे खेलने से छत पर बने गढ्ढे हों या बगल के मकान से सटी दीवार के छिद्र सब भर जाते। पूरे घर में नील डाल कर चूने की पोताई होती। मन्दिर के सीलन भरे दीवार चमकने लगते। भगवान राम का पूरा परिवार नए वस्त्र पहन कर सुंदर दिखता। हम बच्चों को नए कपड़े तो नहीं मिलते पर राम, लक्ष्मण, जानकी और माता दुर्गा की प्रतिमा के लिए नए कपड़े जरूर बनते। बजरंगबली केसरिया पोतकर अलग दमकते रहते। सांवरे राम को सजाने के लिए अशोक के पत्ते, फूल मालाएं और बड़ी बड़ी नई आंखें लाई जातीं। जिस मन्दिर में रोज जीरो वॉट का प्रकाश रहता उस मन्दिर में सौ वॉट के बल्ब और झालरें दम दम चम चम दमकते/चमकते रहते। ऊपर प्रसाद बनता नीचे दुर्गा सप्तशती पाठ के बाद भगवान राम की पूजा होती। इधर घड़ी की सूइयां १२ बजाती, उधर भए प्रकट कृपाला दीन दयाला...शुरू। 

हमेशा बन्द रहने वाले घर के दरवाजे भक्तों के दर्शन के लिए खोल दिए जाते। दिन भर भजन कीर्तन चलता रहता। हारमोनियम, तबला, बैंजो और बांसुरी पर हर उम्र के लड़के हाथ आजमाते। देर रात तक भजन कीर्तन चलता। मजे की बात यह कि यह कहानी केवल हमारे घर की हो ऐसा नहीं है। बनारस के पक्के महाल की गलियों में कई राम मन्दिर हैं। अपने घर का प्रसाद मिलने के बाद हम बच्चे गोल बनाकर गली के सभी मंदिरों में प्रसाद पाने के लालच में घूम घूम कर दर्शन करते। दर्शन के बाद मन्दिर के पुजारी के आगे बढ़े हुए दाहिने हाथ की अंजुरी को नीचे से बाएं हाथ की अंजुरी सहारा देती। अंजुरी में एक चम्मच चरणामृत गिरता और गप्प से मुंह के अंदर। सचमुच अमृत की तरह मीठा होता था चरणामृत का स्वाद! 

मेरा भगवान राम से प्रथम मिलन कब हुआ यह मैं नहीं बता सकता। जैसे कोई बच्चा कैसे बताएगा कि उसने अपने पिताजी को कब देखा? मां को कब देखा? बड़े भाई या बड़ी बहन को कब देखा? वैसे ही मैं यह नहीं बता सकता कि भगवान राम से पहली बार कब मिला! मेरे घर ही राम मन्दिर था और राम मेरे घर के ही सदस्य थे। बिना राम को नहलाए, कपड़े पहनाए, भोजन कराए कोई घर में भोजन कर ही नहीं सकता था। अब कैसे कहें कि मन्दिर की मूर्तियां निर्जीव थीं! घर के किसी सदस्य का कोई सुख ऐसा नहीं होगा जिसमें सबसे पहले राम को भोग न लगा हो। कोई दुःख ऐसा न होगा जो राम को पता न चला हो। आंसू की बूंदें छलकी होंगी तो सबसे पहले प्रभु राम के चरणों में। माता पिता से जो बात न कह सके वो राम से कह दिया। कभी कोई गलत काम का विचार भी मन में आया तो मन में भय लगा रहा कि कोई देखे या न देखे राम तो देख ही लेंगे! उनको पता चल गया तब? कहने का मतलब यह कि मेरे राम तो मेरे जन्म से ही मुझसे जुड़े रहे। बचपन में भले हम सुंदर काण्ड से ज्यादा राम चरित्र मानस न पढ़े हों लेकिन मेरे राम तुलसी के राम से तनिक भी उन्नीस न थे। 

जैसा कि मध्यम वर्गीय परिवार में होता है कि जब परिवार बड़ा और कमाने वाला एक हो, मासिक आय निर्धारित हो तो मुखिया इतना मितव्ययी हो जाता है कि घर के सभी सदस्य उसे कंजूस समझने लगते हैं। जब तक अपने सर पर ओले नहीं पड़े पिताजी को भी सभी कंजूस ही समझते थे। मेरे घर के राम मंदिर में भी जीरो वॉट का एक ही बल्ब जलता था। सुबह की बात तो और थी। बगल में गंगाजी थीं तो गंगा स्नान करना, गंगाजल लाना, नहलाना आनन्द दायक काम था लेकिन शाम को मन्दिर में अगरबत्ती जलाने, नैवेद्य चढ़ाने और घंटा बजाने के लिए घर की सीढ़ियां उतरना बच्चे के लिए टेढ़ी खीर होती थी। मेरे राम काले संगमरमर के सांवले राम थे। अंधेरे में चमकतीं बड़ी-बड़ी आंखों को दूर से देखकर ही भय लगता था। यूं तो बड़े भाई लोग ही शाम की पूजा में जाते मगर यदि भैया कभी पढ़ रहे हों तो वे मुझे ही जाने का आदेश दे देते। यह तब की बात है जब मैंने स्कूल जाना शुरू भी नहीं किया था।

अंधेरे में घर की सीढ़ियां उतरना, राम जी के सामने खड़े होकर अगरबत्तियां जलाना, नैवेद्य चढ़ाना और घंटी बजाना बड़े साहस का कार्य हुआ करता था। बिना गए कह भी नहीं सकते थे की अगरबत्ती जला दिए! घर में जो जहां हो, घंटी की आवाज़ जरूर सुन रहा होता। घंटी की आवाज़ मतलब भोजन मिलने की सूचना। सीढ़ियां उतरते समय हर कदम उनको गरियाता और सीढ़ियां चढ़ते समय हर कदम उनको धमकाता कि आने दो पिताजी को...। मेरी राम से यारी बाद में हुई पहले तो मुझे उनसे बहुत भय लगता था।

जय #राम जी की।

3.3.18

लोहे का घर-40 (बनारस से लखनऊ)

आज फिर झटके वाली #बेगमपुरा में बैठा हूं। हम समझते थे जब हम #डाउन होते हैं तभी झटके मारती है लेकिन ये तो #अप में भी मार रही है! मतलब झटके मारना इस #ट्रेन की पुरानी आदत है। कित्ती पुरानी? ठीक ठीक नहीं पता। कांग्रेस के जमाने से चली आ रही है या २-३ साल पुरानी है कुछ नहीं पता। शायद झटके मारना बेगम के जन्म का रोग हो! चाल ढाल पर मोहित हो लप्प से चढ़ गए, पता चला झटके मारती है! यह तो ट्रेन है, भगवान न करे किसी को ऐसी बेगम मिले।

आज जनरल/स्लीपर नहीं ए.सी. में बैठ कर राजधानी जा रहे हैं। घर से खा पी कर, मूड बना कर चले थे कि दिन भर मस्त सोएंगे मगर इस ट्रेन में कोई सो नहीं सकता। ज्यों झपकी लगी, त्यों झटका लगा। प्लेटफॉर्म पर आए तो एक विभागीय साथी की नजर हम पर पड़ ही गई। सशंकित हो गए कि कहीं यह ट्रांसफ़र कराने के चक्कर में राजधानी तो नहीं दौड़ रहा है! हमने कहा..आज संडे है। सुबह ए बनारस का मजा ले चुके अब सोच रहे हैैं शाम राजधानी पहुंच कर #टुंडे_कबाब का मजा लिया जाय। वे हंसने लगे। मेरी झूठी बात का उन्होंने यकीन नहीं किया और सच्ची बात न बताकर मैंने उन्हें संदेह के महासागर में पूरी तरह डुबो दिया।

लोहे के घर की ए.सी. बोगी में बैठ, लोगों की बातें लिखने का मूड नहीं बनता। बड़े बोर लोग यात्रा करते हैं ऐसी बोगी में। बड़े शहरों की बड़ी कालोनी टाइप के लोग। न किसी से लेना न किसी को देना। कोई वृद्ध किसी फ्लैट में अकेले रहता हो, मर जाए तो उसके बच्चों को उसकी लाश नहीं कंकाल मिले! यही हाल होता है ए सी बोगी के यात्रियों का। खाए पीए, सफेद चादर खुद ही ओढ़ कर सो गए। यहां का माहौल ही ऐसा है। हम भी यहां आ कर इन्हीं के जैसे मनहूस हो जाते हैं। अकेले हैं तो आप को पूरा सफ़र अकेले ही काट देना है। करें भी क्या मेल जोल बढ़ाकर? जहरखुरानी के शिकार हो जाएं? रेलवे भी अपरिचित यात्रियों पर विश्वास न करने की सलाह देता है। हम बनारसी गलियों के अड़ीबाज लोगों के लिए ऐसे वातावरण में बोरियत महसूस होती है। जनरल और कुछ हद तक स्लीपर बोगी में अपने मिजाज के लोग मिलते हैं। मगर सफ़र लंबा हो तो पेट बातों से तो नहीं भरता, शरीर आराम चाहता है।

फिर बड़े जोर का झटका दिया बेगमपुरा ने। ओह! बड़ी देर से खड़ी थी। हम ही गलतफहमी पाले थे कि क्या शांत वातावरण होता है ए. सी. बोगी का! चली तो झटका दिया। मतलब बेगम की बीमारी यह है कि जब भी चलना शुरू करती है जोर का झटका मारती है! झटके सह लिए तो चलिए न फिर आराम आराम से।

सूर्यास्त हो रहा है लोहे के घर में। शीशे वाली बन्द खिड़की का पर्दा हटाकर देख रहा हूं तेज हीन हो रहे सुरुजनारायन। किसी अनजान जगह पर रुकी है ट्रेन और सामने हैं सूर्यदेव। आम के कुछ पेड़ हैं, आम के पीछे सागौन पंक्तिबद्ध खड़े हैं, दूर सरसों और पास गेहूं के खेत हैं। एक कौआ उड़ते हुए, सूरज के सामने से होते हुए बाएं से दाएं गया।

झटका लगा और चल दी बेगमपुरा। फिर एक वाक्य दोहराया बेगम पूरा झटका देती है।

ठहरे हुए पानी के पोखर के किनारे एक लड़का साइकिल खड़ी कर सूरज की प्रतिछाया निहारता दिखा। हमने सूरज भी देखा, लडके को भी देखा और छाया भी देखी। सब एक पल में घटित हो गया। ट्रेन आगे बढ़ चली।

सूरज अब क्षितज के पास जरा सा ऊपर, दूर घने वृक्षों की फुनगी-फुनगी गेंद की तरह उछलते दिख रहा है। अभी प्रकाश है। सत्ता के जाने के बाद सत्ता के भय की तरह। कुछ समय बाद ढल जाएगा। उगते समय क्या रंग में था! चढ़ते चढ़ते तपने लगा। अब ढलते-ढलते निस्तेज हो चुका है। रोज पूरे जीवन का सार पढ़ाता है मगर हम धूप और अंधेरा ही पढ़ पाते हैं।

पशुओं के लिए घास के भारी ढेर सर पर लादे पगडंडी पगडंडी नंगे पांव चलती बूढ़ी दो महिलाएं ट्रेन को जाते देख जरा भी नहीं रुकीं। ट्रेन अपने रास्ते, ग्रामीण महिलाएं अपने रास्ते। निर्जीव की तरह अपने रास्ते चलते रहना दोनो की मज़बूरी।

अब सूरज नहीं दिख रहा। अंधेरा भी नहीं हुआ है। गोधूलि बेला है लेकिन न धूल है न गायों के झुंड। बल्ला लेकर भागता एक लड़का दिखा। सरसों के पीले चौकोर खेत के एक कोने पर पहरेदार की तरह खड़ा एक बूढ़ा नीम दिखा। साइकिल का टायर दौड़ाते हुए बच्चे दिखे। हम बूढ़े हो चले मगर जब तक खेत दिख रहे हैं तब तक लोहे के घर की खिड़की से ही सही अपना बचपन भी दिखता रहेगा। 

दिन ढल चुका, अब शाम ढल रही है। शहर बदल रहे हैं। लखनऊ के बाद अब फैजाबाद बीता है। चलते- चलते ही देर हुई। लेट किसान मिली जो और लेट हो गई। बनारस पहुंचते पहुंचते आज की तारीख बदल जाएगी। कल से फिर डयूटी पर। लोहे का घर हमें छोड़ता नहीं या हम लोहे के घर को नहीं छोड़ते। लगता है दोनो इक दूजे के लिए बने हैं। बिटिया साथ में है, उसी को साक्षात्कार दिलाने गए थे लखनऊ। रोजगार पाने के लिए एक अंतहीन दौड़। अपन तो विश्वविद्यालय से निकल झट से एक खूंटे से बंध गए। बच्चों का संघर्ष कठिन है। शायद यह दौर ही कठिन है।

चार लड़कियां चढ़ी हैं फैजाबाद से। लगता है ये अभी पढ़ रही हैं। धनबाद जा रही हैं। वहां से रांची जाएंगी एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी। अपने पढ़ाई की बातें खूब चहक चहक कर कर रहीं हैं। इनकी शब्दावली अपने पल्ले नहीं पड़ रही। मन कर रहा है इनकी बातों को लिखा जाय मगर ये इतनी जल्दी जल्दी बोल रही हैं कि क्या कहें! अपनी बिटिया इनकी बातों पर जरा भी कान नहीं दे रही। वो कोई फिलिम देखने में मगन है। कई दिनों बाद फुरसत और बेफिक्री के पल मिले हैं। उसी का आनन्द ले रही है।लोहे के घर की यही खास बात है। चढ़ने से पहले खूब हड़बड़ी मगर एक बार बैठ गए तो फिर जो मर्जी सो करो। मन करे बहस करो, मन करे पढ़ो, मन करे लिखो या फिर फिलिम देखो। जैसा माहौल मिले वैसा करो। अब लड़कियों ने अपना लैपटॉप निकाल लिया है। मूवी देखने के मूड में हैं। रात के दो बजा चाहते हैं. किसान पहुँच रही है बनारस.

लोहे का घर-39

उंगलियों में गुलाब पकड़े 
मीलों चले हैं 
पैदल-पैदल 
न झरी 
एक भी पंखुड़ी 
न भूले राह
मंजिल से पहले।

वेलेंटाइन के दिन भी पटरियों पर दौड़ रही हैं ट्रेनें। चउचक नियंत्रण है ऊपर वाले का। जब हरी झंडी दिखाए चलना है, जब लाल तो रुक जाना है। न आगे वाली माल को छू सकती है न पीछे वाली पैसिंजर को। दाएं बाएं से गलबहियां करना तो लाहौल बिला कूवत! क़यामत आ जाएगी। नारी भले स्वतंत्र हो जाए एक दिन, #ट्रेन नहीं हो सकती। इसकी किस्मत में चीखना, चिल्लाना और सेवा करना ही लिखा है। न छुट्टी न वेलेंटाइन।
आज शिवरात्रि है। काम के देवता कामदेव, प्रेम के देवता कृष्ण फिर शिव कौन? संहार के देवता?
प्रेम के लिए दृष्टि चाहिए। दूसरे बिदक गए शिव के गले में नाग देख कर लेकिन पार्वती ने शिव में सत्य देखा! शिवम् देखा! सुंदरम देखा। प्रेम किसी संत के उपदेश के बाद आया है क्या धरती पर? यह तो प्रत्येक प्राणी में जन्म के साथ मिलने वाला स्वभाव है। इसका कोई एक खास दिन कैसे निर्धारित हो सकता है? यह तो मौका मिलते ही हो जाने वाला प्राणियों का स्वभाव है।
बहुत से लोग बैठे हैं लोहे के घर में। बिना रुके चौबीस घंटे लोगों को अपनी मंजिल तक पहुंचाना भी तो प्रेम करना है। ट्रेन तो हर पल वेलेंटाइन मनाती है। समझने के लिए दृष्टि चाहिए।

संसार में दो तरह के लोग पाए जाते हैं एक आलोचक दूसरे प्रशंसक। आलोचक साहित्य से छिटक कर राजनीति में चले गए। प्रशंसक राजनीति से छिटक कर साहित्य में आ गए। देश में कोई घोटाला होता था तो सबसे पहले विपक्ष दुखी होता था। अब उल्टा हो गया है। घोटाले की खबर सुनते ही विपक्ष की लॉटरी खुल जाती है। उन्हें सत्ता पक्ष की आलोचना करने और अपनी राजनीति चमकाने का सुनहरा अवसर हाथ लगता है। घोटाले के बिना राजनीति बाबाजी के ठल्लू की तरह अधर में लटकती रहती है। घोटाले की खबर नियाग्रा की वह गोली है जिसके सुनने मात्र से राजनीति जवान हो जाती है।
साहित्य में रुचि रखने वाले आभासी दुनियां के रण बांकुरे छोटी छोटी पोस्ट डाल कर मोटी पुस्तक के लिए सामग्री जुटाते हैं। इस क्रम में वे दूसरों की पोस्ट भी पढ़ते हैं। अच्छे अच्छे आलोचकों को यहां प्रशंसा मोड में देखा जा सकता है। वे दूसरों की पोस्ट खूब ध्यान से मन लगाकर प्रशंसा करने की नेक नियति से पढ़ते हैं।
कुछ तो अच्छा लिखा मिल जाय जिसकी प्रशंसा की जा सके! एक लाइन ही सही। एक अच्छी लाइन मिल गई तो बढ़िया कमेंट तैयार। एक भी अच्छी लाइन न मिली तो वाह! और सुंदर जैसे शब्द न्योछावर कर आगे बढ़ जाते हैं। यूं समय बरबाद करके जो कमेंट बैक सुख मिलता है उससे उनकी लेखन क्षमता में हरास होता है या वृद्धि ये तो वही जाने लेकिन इस कमेंट कमेंट के खेल से लेखकों में व्याप्त नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मक सोच विकसित होती है। राजनेता भी अब इस गुण को भांप कर अपने कार्यकर्ताओं को आभासी दुनियां में सक्रीय रहने का उपदेश देते रहते हैं। यह भी संभव है कि राजनेताओं के देखा देखी चोर डाकू भी आभासी दुनियां में संत बने घूम रहे हों! अब यह खतरा तो उठाना ही पड़ेगा। अब इसी पोस्ट को लें। मुझे पक्का विश्वास है कि इसकी भी आलोचना नहीं होगी। प्रशंसा और लाइक ही मिलेगी भले कम मिले।

भोले की आरती ख़तम हो चुकी। भण्डारी स्टेशन पर पचीस मिनट पहले ही आ कर खड़ी है गोदिया। समय होगा तभी चलेगी। लेट आने पर लेट चलती है, बिफोर आती है तो समय से चलती है। आज लोहे के घर के कोपचे में बैठे हैं। ऊपर, मिडिल और नीचे एक एक बर्थ सामने दीवार। दाएं सामने की ओर दरवाजा, बाएं खिड़की। यह कोना तो लोहे के घर का कोपभवन लगता है! लेट कर देश की चिंता करते हैं।
लाख छेद बन्द करो घर में चूहे आ ही जाते हैं। लाख नल बन्द करो कहीं न कहीं पानी टपकता ही रहता है।मच्छरदानी चाहे जितना कस कर लगाओ, सुबह एक न एक खून पी कर मोटाया मच्छर दिख ही जाता है। यही हाल अतंकवादी का है, यही हाल घोटाले का है। हम यह ठान लें कि न खाऊंगा, न खाने दुंगा तो भी एकाध चूहे फुदकते दिख ही जाते हैं। हम भले न खाएं वे तो खाने के लिए ही धरती पर अवतरित हुए हैं। अन्न न मिला तो किताब के पन्ने, कपड़े.. जो मिला वही खाने लगते हैं। एकाध चूहों के खाने से, एकाध मच्छर के खून पीने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। घर की दिनचर्या रोज की तरह चलती रहती है। आफत तो तब आती है जब दीवारें दरकने लगती हैं। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। दुर्घटना उस घर में अधिक घटती है जहां जनसंख्या अधिक और नियंत्रण करने वाला एक। संयुक्त परिवार के बड़े से घर में जहां सारा बोझ मुखिया के कन्धे पर होता था सभी सदस्य आंख बचा कर मौज उड़ाने की जुगत में रहता था और घर की चिंता का सारा बोझ घर का मुखिया ही उठाता था। ऐसे घर में चूहे भी आते, मच्छर भी होता, खटमल भी निकलते और नल की टोंटी भी खुली रह जाती।
राजशाही में राजा ही सब कुछ होता था। वह सर्वगुण सम्पन्न हुआ तो देश अच्छा चला, गुणहीन हुआ तो देश गुलाम हुआ। तानाशाह हुआ तो जनता हाहाकार करने लगी, दयालू हुआ तो जनता मौज करने लगी। राजशाही की इन्हीं कमियों ने लोकतंत्र को जन्म दिया। सत्ता के अधिकारों और दायित्वों का राज्यों, शहरों, कस्बों से लेकर गांवों तक समुचित वितरण और केंद्र का कड़ा नियंत्रण। जनता का, जनता के लिए जनता के द्वारा शासन। यह एक सुंदर और कल्याणकारी व्यवस्था है। यह व्यवस्था उस देश में अत्यधिक सफल रही जहां जनसंख्या कम और शिक्षा का प्रतिशत अधिक रहा। भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश में जनसंख्या भी अधिक और शिक्षा का स्तर भी दयनीय। कोढ़ में खाज राजनेताओं/धर्मोपदेशकों की कृपा से धर्म और जाति के आधार पर बंटी जनता। अब ऐसे माहौल में आतंकवादी न आएं, घोटाले न हों तो यह स्वयं में एक बड़ा चमत्कार होगा। देश की मूल समस्या जनसंख्या नियंत्रण और शत प्रतिशत साक्षरता है। इंदिरा जी ने जनसंख्या नियंत्रण को समझा तो नौकरशाही ने ऐसा दरबारी तांडव किया कि उन्हें सत्ता से ही बेदखल होना पड़ा। उन्हें भी लगा होगा कि सत्ता में बने रहना है तो इस मुद्दे को ही भूल जाओ। फिर किसी ने हिम्मत नहीं करी। मूल समस्या पर किसी का ध्यान नहीं।
गोदिया समय से बनारस पहुंच गई। देश की चिंता फ़ुरसत से मिले बेकार से किसी दूसरे समय में। आप फ़ुरसत में हों और देश की चिंता को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो स्वागत है। आम आदमी फालतू समय में ही देश की चिंता कर सकता है।

ट्रेन पटरी से चिपक कर हवा से बातें कर रही है। जगे यात्री मोबाइल से चिपक कर मजे ले रहे हैं। रात का समय है, कोई देश की चिंता नहीं कर रहा। खबरों से भागने लगे हैं लोग। क्रिकेट, संगीत, वीडियो, आभासी दुनियां की छोटी छोटी पोस्ट या फिर फिलिम। खासकर कामकाजी, मजदूर या किसान..अपने मतलब की बातें जान लिए फिर दूसरी खबरों से ऐसे भागते हैं जैसे किसी सर्प को देख लिया! जैसे कोई पागल कुत्ता काटने ही वाला हो! ख़बरें उनके लिए जिनके पास कोई काम न हो। चैनल वाले चाहें तो रायशुमारी करा लें। जिन खबरों को वे बड़े चाव से दिखाकर बहस कराते हैं उन्हें कामकाजी लोग नहीं देखना चाहते। उनके पास फालतू समय नहीं है। #ट्रेन में बैठकर फालतू समय में भी अब लोग खबरों पर बहस करने से अच्छा आंखें बन्द कर ऊंघना चाहते हैं।

निर्धारित समय पर चल रही है अपनी #फोट्टी_नाइन। भारत में #ट्रेन का निर्धारित समय पर चलना इस बात का संदेश है कि ठंडी जा चुकी है, अच्छे दिन आ चुके हैं। इस रूट पर कई दिनों से पटरियों के दोहरीकरण का काम चल रहा था जिससे निरस्त कर दी गई थीं कई ट्रेनें। अब काम पूरा होने के बाद हवा से बातें करते हुए दुगुने उत्साह से चल रही है ट्रेन।
अपने देखे रास्तों में जौनपुर सिटी से सुल्तानपुर और बलिया से वाराणसी के बीच युद्ध स्तर पर पटरियों के दोहरी करण का काम चला। एक पूरा हो गया और दूसरा भी पूरे होने के कगार पर है। इन मार्गों पर चलते हुए कई बार यह प्रश्न उठता था कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हम सिंगल पटरी पर चलने के श्राप से अभिशक्त हैं! क्रासिंग शब्द सुनते-सुनते कान पक चुके। दोहरीकरण की योजनाएं पहले से बनी लेकिन काम अब जाकर पूरा हुआ। इसके लिए वर्तमान सरकार और #भारतीय_रेल की तारीफ की जानी चाहिए। ट्रेनें भले लेट चलीं लेकिन हाल के वर्षों में प्लेटफॉर्म और रेलवे ट्रैक पर खूब काम हुआ। पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह उपेक्षित भू भाग भी विकास के मार्ग पर अग्रसर है। अब उम्मीद है कि ट्रेनें निर्धारित समय पर चलेंगी और यात्रियों का कीमती समय बचेगा। लगता है ट्रेन यात्रियों के अच्छे दिन आने वाले हैं।

लोहे का घर-38 (बनारस से दिल्ली)



यह लोहे का घर जरा हट कर है। इसमें सभी गरीब ए.सी. में सफ़र करते हैं। कोई भेदभाव नहीँ। न जनरल, न स्लीपर सभी ए. सी. कमरे। नाम भी क्या बढ़िया! गरीब रथ । शाम को बनारस से चढ़कर सो जाओ, सुबह दिल्ली पहुंच जाओ। गरीबों के लिए भी दिल्ली दूर नहीं। समाजवादी कल्पना साकार होगी तो ऐसे होगी। चादर कम्बल चाहिए तो २५ रुपए और देने पड़ेंगे। आप स्वतंत्र हैं, टिकट लेते समय बुक कराएं या न कराएं। टिकट रिजर्व कराने में ही आप अत्यधिक गरीब हो चुके हैं तो बिना चादर के सो सकते हैं। कुछ लोग बिना चादर के भी सोए हैं। सभी गरीब को सफेद चादर कहां नसीब होता है!

अपन को नींद नहीं आती लोहे के घर में। पटरी और चक्कों की रगड़ धुन ध्यान भंग कर देती है। सोचा था रोज जनरल/स्लीपर में सफ़र करने वाला दिनभर का थका मांदा, गरीब रथ  के ए.सी. बिस्तर में सोएगा तो मोबाइल बन्द हो धरी रह जाएगी और पलकें अपने आप बन्द हो जाएंगी। दो स्टेशन तो कंट्रोल किया मगर हाय! उंगलियां फिर मोबाइल पर चलने लगीं!!! यह कोई बीमारी तो नहीं लग गई हमें?
सभी गरीब सफेद चादर ओढ़कर सो रहे हैं और मुझे नींद नहीं आ रही। आगे के खाली बर्थ पर कुछ लोग अभी प्रतापगढ़ से चढ़े हैं। टिफिन निकाल कर रोटी सोटी खा चुके अब चादर के लिए लाइन लगाए हैं। एक आदमी चादर,कम्बल और तकिया ले कर आ रहा था तो बगल वाला अचानक से उठकर उससे चादर मांगने लगा! उसने हंसकर कहा.. मैं चादर देने वाला नहीं हूं भाई। चादर वहां मिल रहा है। उठकर चादर मांगने वाला शर्मिंदा हुआ..तब तक ओह! सॉरी सॉरी करता रहा जब तक अपना चादर ले कर आने वाले ने यह नहीं कह दिया..कोई बात नहीं, गलती सबसे हो जाती है। मेरी समझ में अभी तक यह नहीं आया है कि यह गलती उसकी है या व्यवस्था की! लेकिन एक बात समझ में आ गई कि गरीब कितने शरीफ होते हैं।
दिन में एक या दो घंटे के सफ़र में जब ट्रेन आधे घंटे के लिए रुक जाती है तो रोज के यात्री बेचैन हो प्लेटफॉर्म पर टहलने और स्टेशन मास्टर से देरी का कारण पूछने लगते हैं। रात में गरीब रथ के ए. सी. कमरे में सभी चैन से सो रहे और ट्रेन बहुत देर से न जाने किस स्टेशन पर रुकी पड़ी है। रात में ट्रेन रुक जाए तो लंबी दूरी के यात्री और भी आराम से गहरी नींद में चले जाते हैं! शायद उन्हें लग रहा है कि होटल के कमरे में बड़ी शांति है। लगता है लोगों को रात में पढ़ने की बीमारी नहीं है। तब रात में लिखना अंधेरे में तीर चलाने के समान है। 
लोहे के घर में गुड मॉर्निंग हो रही है। सामने दो बिहारी युवा हैं। एक लेटा है दूसरा सट कर बैठा है और मोबाइल में बड़ी देर से अपनी गर्ल फ्रेंड से बातें कर रहा है। जो लेटा है वो बैठे वाले को छेड़ रहा है और ही ही ही ही कर रहा है। ए सी बन्द बोगी है शायद इसलिए कभी कभी लड़की की बोली भी सुनाई पड़ जा रही है। अब ऐसे में नींद न टूटे तो क्या हो? उनको कैसे कहा जाय कि डिस्टर्ब न करो! बरेली स्टेशन के आउटर पर देर से रुकी है #ट्रेन। इसी प्लेटफॉर्म पर एक लड़की ने बरेली की बर्फी खरीद कर घर से भागने का विचार त्याग दिया था। फिलिम की वो हीरोइन याद आ रही है और सामने बैठे युवक से मोबाइल में बात करती लड़की की आवाजें सुन रहा हूं। कुछ लड़कियां कितनी पागल होती हैं! नहीं जान पातीं कि लड़के उन्हें बर्फी समझते हैं और खाने के लिए ही चैट करते हैं।
बरेली से चली है ट्रेन। बहुत देर से अपना सामान लिए टायलेट के पास उतरने के लिए भीड़ लगाए यात्री उतर गए। कुछ नए चढ़ गए। वेंडर भी समय के हिसाब से चढ़ते हैं ट्रेन में। अभी पेपर सोप, चाय और अखबार बेचने वाले अजीब अजीब आवाजें निकाल रहे हैं। मोबाइल में बातें करने वाला लड़का अपने मित्र को गर्ल फ्रेंड की बातें सुनाकर अब अपनी बर्थ में जा कर बातिया रहा है। चाय बेचने वाले अजीब अजीब आवाजें निकालने में माहिर होते हैं। पकौड़ी बेचने वाले को चाय बेचने वाला सम्मान नहीं देगा तो क्या मंठा बेचने वाला देगा? लोग मर्म को समझते नहीं है। लोहे के घर की खिड़की के बाहर खूब उजाला हो चुका है। यह समय भाग कर ट्रेन पकड़ने का है मगर आज तो ट्रेन ही हमें पकड़े हुए है। आ गय दिल्ली, उबर बुक कराए. पहुँच गए अपने पहले से बुक कराए हुए होटल में. अब  एक शहर से दूसरे शहर में जाना कितना आसान हो चला है!

कल नोएडा में रुका था। शाम को खाली हुआ तो किसी ने बताया यहां घूमने के लिए अक्षर धाम मंदिर ही बढ़िया रहेगा। होटल से निकलते निकलते सवा छः बज गए। रास्ते में सलिल भैया को फोन लगाया और कल के लिए मुलाकात का समय तय करने लगा। आभासी दुनियां में बने मित्रों में कुछ लोग हैं जिनसे मिलने की इच्छा मन में हमेशा दबी रहती है। सलिल भैया भी उन्हीं में से एक हैं। जैसे ही मैंने कल सुबह मिलने की बात करी वे सहर्ष तैयार हो गए, मेरे होटल का पता पूछकर कल आने का वादा किया और आज का प्रोग्राम पूछने लगे। जैसे ही मैंने बताया कि हम अक्षर धाम मंदिर जा रहे हैं उन्होंने बताया कि अब तो मन्दिर बन्द हो गया होगा। आपको अंदर जाने ही नहीं मिलेगा। रास्ते में ही हमने प्रोग्राम चेंज कर दिया। उनसे आने की अनुमति और घर का पता मांगा। अगले ही पल घर के पते का मैसेज आ गया।
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कॉलोनी के चौकीदार की मदद से घर पहुंचा तो मां मिल गईं, भाभी मिल गई और मिली प्यारी बिटिया झूमा। भैया मुझे लेने बाहर गए थे। आह! चला था 'अक्षर धाम मंदिर' के लिए पहुंच गया 'घर एक मन्दिर'। भव्य तो खूब होगा अक्षर धाम मंदिर मगर मन्दिर पहुंच कर जो वाइब्रेशन महसूस होता है, जो ऊर्जा मिलती है वह सब यहीं मिल गया। लगा ही नहीं कि पहली बार आया हूं, पहली बार मिल रहा हूं। अब आधुनिक जीवन शैली की आपाधापी में ऊँचे-ऊँचे बिल्डिंग, बड़े-बड़े मकान तो खूब दिखते हैं मगर घर कम दिखते हैं। प्यारी बिटिया, स्वादिष्ट भोजन, भाभी का प्यार, भैया का स्नेह और मां का आशीर्वाद एक घर से जब इत्ता सारा प्रसाद एक साथ मिल जाय तो वह घर मन्दिर लगने लगता है। ऐसा ही लगा मुझे सलिल भैया का घर।


फिर बेतलवा डाल पर। दौड़ भाग खतम हुआ फिर इत्मीनान से लेट गए लोहे के घर में। इसमें जो सुकून है वो बनारस दिल्ली घूमने में कहां! न कोई काम न कोई बॉस। दिन में बैठ कर भारत दर्शन करो, रात में सफेद चादर बिछाओ, सफेद चादर/कम्बल ओढ़ो और लेटे रहो। लोहे का घर न होता तो एक रात की दूरी पर न होते दोनो शहर।
यह गरीब रथ नहीं, शिव गंगा है। शाम सात बजे दिल्ली से चलती और सुबह सात बजे बनारस। दिल्ली और बनारस के बीच कानपुर और इलाहाबाद केवल दो स्टेशन। ऐसे ही लौटते समय भी। दो दिन की छुट्टी में आराम से बनारस वाले दिल्ली और दिल्ली वाले बनारस घूम सकते हैं।
चार पढ़े लिखे कामकाजी समझदार दिख रहे युवकों की अनवरत जारी बेवकूफियों के अतिरिक्त सभी अपने अपने बर्थ पर लेट चुके हैं। ये चारों मित्र लगते हैं। दो के पास साइल लोअर की एक एक बर्थ है और दो की सीट कनफर्म नहीं है। चारों लगातार गिट पिट गिट पिट बतियाए जा रहे हैं। बातें कोई खास नहीं। जैसे कोई कहता है कि हमने कुत्ते की पूंछ देखी जो गोल गोल घुमी हुई थी और तीनों ठहाके लगा कर हंसने लगते हैं। मतलब इतनी ही कोई साधारण सी जोक और हंसी के ठहाके! ये उम्र ही शायद ऐसी होती है।
हम अपर बर्थ पर और बिटिया साइड अपर बर्थ पर लेटे हैं। मेरे नीचे मिडिल बर्थ पर एक पंजाबी महिला अपने बच्चे के साथ खा पी कर लेट चुकी हैं। इनकी एक भाभी भी हैं जिनकी बर्थ बगल वाली बोगी में है। ट्रेन में चढ़ते ही उन्होंने टिफिन खोल कर पहला काम यही किया कि पंजाबी में घर की सब बातें करते हुए जल्दी जल्दी, गरम गरम आलू और परांठे निकाले और चाव से खाए। इनकी बातों का सार यही था कि हमको ये करना पड़ा, वो करना पड़ा और अगर जल्दी न करते तो ट्रेन छूट जाती।खा पी कर ननद को और बच्चे की सुला कर भाभी गईं अपनी बोगी में। उनके नीचे वाली लोअर बर्थ पर एक मुस्लिम युवक है जो चुपचाप मोबाइल में फिलिम देख रहा है और कान में तार ठूंस कर डायलॉग सुन रहा है। मेरे सामने अपर बर्थ पर एक पापा अपनी छोटी बच्ची के साथ लेटे हैं। मिडिल और लोअर बर्थ वाले भी थके/पके लगते हैं। चादर ओढ़ कर चुपचाप सो रहे हैं। बस चारों पढ़े लिखे समझदार कामकाजी युवकों के अलावा कोई शोर नहीं कर रहा। ईश्वर इनकी आत्मा को भी शांति प्रदान करे। इनके सीट भी कनफर्म हो जाएं और ये भी चुपचाप सो जाएं। 
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सुबह हो चुकी है। आ चुके हैं बनारस। ट्रेन आउटर पर खड़ी है। लग रहा था समय से पहले पहुंचा देगी। ट्रेन ऐसे चले तो क्या बात है!



लोहे का घर-37

39gtc गोरखा रेजीमेंट की मिलेट्री छावनी के किनारे किनारे चल रही है अपनी ट्रेन। काले नाली सी वरुणा नदी के पार भी हैं बबूल के जंगल। ये कांटे भरे जंगल के बाढ़ सुरक्षा की दृष्टि से लगाए गए होंगे।
शिवपुर स्टेशन पर नहीं रुकती ट्रेन। प्लेटफॉर्म के किनारे - किनारे रखे थे सीमेंट के बोरे। अब शहर को पार कर सरसों/अरहर के खेतों के किनारे पटरी पर भाग रही है ट्रेन।
अगला स्टेशन बीरापट्टी है। लगभग हर छोटे स्टेशनों पर रुकते हुए पैसिंजर की तरह चलती है अपनी फोट्टी नाइन। उजाड़ सा स्टेशन है। स्टेशन के किनारे रेलवे कर्मियों के आवास हैं। एकाध को छोड़ बाकी खंडहर में बदल चुके दिखते हैं।
सरसों और अरहर के बीच अब गेहूं भी दिखने लगे हैं। चारों तरफ हरियाली है। आराम से दाना चुग रहे पंछी इंजन के शोर से उड़ते/भागते दिखते हैं। ट्रेन की खिड़की से पटरियों के किनारे बने मकानों में आम आदमी की बिखरी गृहस्ती दिखती है। खड़ी खाट पर सूख रही कथरी, हैंड पाइप के पास रखे जूठे बर्तन, बिटिया के बाल संवारने में लगी मां और दातून करते खेतों की मेड़ पर चल रहे दद्दू, सब दिखते हैं।
बाबतपुर स्टेशन पर रुकी है ट्रेन। यहां हवाई अड्डा है। कुछ लोग भागते हुए चढ़े हैं। कुछ उतर कर सामान गिन रहे हैं। चाय वाले, मटर वाले कई प्रकार के लोकल वेंडर चढ़े हैं बोगी में। ट्रेन यहां से भी चल दी। मसाले वाले मटर की गंध घुल गई है बोगी में। आम के बाग दिख रहे हैं। पीले सरसों के खेतों के ऊपर से उड़कर भागे हैं कुछ पंछी। ये बूढ़े वृक्ष भी दंग हो जाते होंगे धरती के बदलते परिधान देख कर। ये बिचारे एक जैसे और हर मौसम में रंग बदलती धरती।
पिंडरा हाल्ट पर एक मिनट के लिए रुकती है ट्रेन। भड़भूजे की झोपडी में कोई नहीं था। एक बूढ़ा दोनों हाथों में पानी की बाल्टी लिए ठहर ठहर चला जा रहा था। आगे एक सूखी नहर दिखी। एक किनारे बूढ़ा बरगद और दूसरे किनारे सरसों के पीले फूल। नहर में पानी होता तो और भी खूबसूरत सीन होता।
पिंडरा हाल्ट के बाद अगला स्टेशन खालिसपुर। यहां रेलवे का कारखाना है। पटरियों पर बिछने वाले स्लीपर बनते हैं यहां। यहां से शुरू हो जाती है जौनपुर की सीमा।
त्रिलोचन महादेव। इस स्टेशन पर भी नहीं रुकती अपनी ट्रेन। बनारस से जौनपुर मार्ग में शिवपुर और त्रिलोचन महादेव यही दो छोटे स्टेशन हैं जिन पर नहीं रुकती अपनी एक्सप्रेस वरना तो हर छोटे स्टेशनों पर पैसिंजर की तरह रुकते हुए चलती है। कभी रुकी होगी और महादेव ने छना दिया होगा भांग! तभी शिव से घबराती है।
सई नदी के किनारे है अगला स्टेशन जलालपुर। इस नदी पर जो पुल बना है उसे लोग जलालगंज का पुल कहते हैं। ट्रेन जब पुल से गुजरती है तो सामने दो और पुल दिखाई पड़ते हैं सड़क यातायात के लिए। एक पुराना है अंग्रेजों के जमाने का दूसरा नया है। पुराने पुल के खंबे बहुत मोटे हैं।
जलालगंज के बाद दो और स्टेशन है। सरकोनी और जफराबाद। सरकोनी में एक मिनट के लिए रुकती है ट्रेन। यहां रेलवे पटरी के किनारे फैली झाड़ियां आकर्षित करती हैं।
जफराबाद महत्वपूर्ण स्टेशन है। यहां से रेलवे के दो मार्ग शुरू होते हैं। एक जौनपुर सीटी स्टेशन, सुल्तानपुर होते हुए लखनऊ तो दूसरा जौनपुर भण्डारी, फैजाबाद होते हुए लखनऊ। जौनपुर में तीन स्टेशन हैं और तीनों में जफराबाद सबसे महत्वपूर्ण है। यह अलग बात है कि शहर से दूर होने के कारण इसका विकास बाकी दो की तुलना में कम हुआ है। बनारस जाने के लिए जफराबाद में दोनो तरफ से आने वाली ट्रेनें मिल जाती हैं। सड़क मार्ग बढ़िया कर इस स्टेशन पर और भी ध्यान देने की आवश्यकता है।
मूड ही तो है। आज बनारस जौनपुर मार्ग के स्टशनो की ही चर्चा हो गई। इन स्टेशनों के बारे में कोई मित्र कुछ और जानता हो तो उनके कमेंट का स्वागत है। जो पढ़कर बोर हुए उनसे क्षमा।

वेलेंटाइन

खत में गुलाब क्या आया! बिचारे कवि जी की खाट खड़ी, बिस्तरा गोल हो गया। उसने लाख अपने श्री मुख से अपनी श्रीमती को समझाने का प्रयास किया कि आज वेलेंटाइन डे है। फेसबुक में एक प्रेम कविता पोस्ट करी थी। बहुत सी लड़कियों को पसंद आया था। किसी बुढढे कवि मित्र को हृदयाघात लगा है और उसने मारे जलन के जानबूझ कर शरारतन गुलाब भेजा है कि मेरा घर में ही जीना हराम हो जाय लेकिन श्रीमती जी को नहीं यकीन करना था, नहीं किया।

सच सच बताओ ये सोनम कौन है? मैंने तुम्हारी जेब में एक बार सोनम बेवफा है वाला एक दस रुपए का नोट देखा था। कितनी मुश्किल हुई थी उसे चलाकर नंदू बनिया की दुकान से आजवाइन खरीदने में। सब नोट देख कर हंसने लगे थे और मैंने घर आ कर मारे गुस्से के दाल में जीरा के बदले आजवाइन का तड़का दे दिया था। आज कलमुंही ने लिफाफे में गुलाब भेजा है। देखो! लाल स्याही से लिखा है..सोनम।

तुमने खत पढ़ा? क्या लिखा था?

मैंने लाल मिर्चे के साथ उसे आग में झोंक कर आज सुबह ही मुन्ने की नज़र उतारी है। और तो याद नहीं लेकिन बेशर्म ने कविता की दो लाइन लिखी थी..

आन क लागे सोन चिरैया, आपन लागे डाइन! 
बिसरल बसंत अब त राजा आयल वेलेंटाइन।


तुम लोगों को अपनी पत्नी डाइन लगती है? दूसरे की सोन चिरैया? आज इस घर में या तुम रहोगे या मैं।
अरे! यह तो बेचैन आत्मा की कविता है। नेट में पूरी कविता मौजूद है। तुम्हें यकीन न हो तो खुद देख सकती हो। यह जरूर उसी का काम है।

कवि जी को खुद को निर्दोष साबित करने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े। मुश्किल से उनकी भोली भाली श्रीमती जी का गुस्सा शांत हुआ होगा और उनकी खड़ी खाट फिर बिछ पाई।

वेलेंटाइन ने नई पीढ़ी को जितना मौज, बेरोजगारों को जितने रोजगार दिए और घर बसाने में जितना योगदान दिया उतना ही घर उजाड़ने में सहयोगी भूमिका भी अदा करी है। उत्सव धर्मी भारतीयों को भले संत वेलेंटाइन के मानवीय प्रेम की कथा का ज्ञान न हुआ हो प्रेम के इजहार के इस नवीन थ्योरी को अपनाने में वर्ष भर की देरी नहीं करी। यह परंपरा त्योहार की तरह भारत में ऐसे मनाया जाने लगा जैसे पहले से तपे तपाए बुरादे में थोड़ी चिंगारी की जरूरत हो और पूरा ढेर धू धू कर जलने लगे। आग पहले से लगी हो बस थोड़ा नकली घी डाल कर स्वाहा! बोलने की देर हो।

दिल तो हमारा भी धड़कता था और भीगा बदन पहले भी जलता था। हमें नहीं पता था तो बस इतना नहीं पता था कि साल में एक दिन आता है जब हम 'इलू इलू' बोल सकते हैं। यही एक संकोच ने न जाने कितने लड़कों को अपनी वेलेंटाइन के घर जा कर उनके शादी में बरातियों के जूठे पत्तल भी उठाने और लड़की के बाप के सुर में सुर मिला कर 'बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले' गाने पर मजबूर किया। कितने लड़कों ने दुखी मन से राखी बंधवा ली और जीवन भर भाई धर्म का पालन किया। हमारी पीढ़ी के न जाने कितने दंत हीन मसूड़े वाले आज भी यह मानते हैं कि काश! यह त्योहार पहले आया होता।

दरअसल वेलेंटाइन और कुछ नहीं उच्छृंखल होने की सामाजिक मान्यता है। शराब पीने की सामाजिक मान्यता मिल जाय, प्रेम प्रदर्शन करने की सामाजिक मान्यता मिल जाय। लीव इन रिलेशनशिप के नाम पर साथ रहने और सेक्स करने की मान्यता मिल जाय तो फिर और क्या चाहिए? न सामाजिक जिम्मेदारी न और कोई झंझट फिर तो सभी यही कहना चाहेंगे.. जय हो वेलेंटाइन बाबा की।

स्वेटर/जैकेट कब उतारोगे बन्धु?

तुम स्वेटर/जैकेट कब उतारोगे बन्धु? अब तो होली भी आ गई! जब तुमने दूसरों की देखा देखी पहनना शुरू किया था तब चउचक ठंड थी। अब तो धूप जलाने लगी है। बुजुर्गों की हर बात को कान नहीं देते। वे तो कहेंगे ही ...यही समय ठंड लगती है! स्वेटर पहन कर, मफलर से कान बांध कर चलो।

सरसों कटने का समय आ गया, गेहूं बड़े हो चले और अभी तक तुमने जैकेट नहीं उतारे! बसंत तुम्हारी चमड़ी को छू भी नहीं पाया क्या! होली भी स्वेटर पहन कर खेलोगे? जैसे दस्ताने उतारे, मफलर उतारे वैसे अब स्वेटर भी उतार कर धुलने को दे दो। महिलाओं से कोई सबक नहीं सीखा!

जाड़े की धूप अब प्यारी नहीं रही, जाड़ा अपनी वेलेंटाइन धूप को साथ ले गया। अब तो वेलेंटाइन के बाद की कड़क धूप तुम्हारे स्वेटर का मजाक उड़ा रही है। इसे अब एक बाल्टी पानी में डुबो दो।

तुम सब्जी खरीदने नहीं जाते! कटहर, नेनुआं और भिंडी पर तुम्हारी निगाहें नहीं पड़ीं? अभी भी गोभी, छिम्मी से चिपके हुए हो! कब तक मटर+पनीर खाओगे बन्धु? अब स्वाद बदलो, नया माल अंदर आने दो। रम का जमाना गया अब ठंड का गम भूल बीयर/व्हिस्की का मजा लो।

तुमने किसानों को नंग धड़ंग खेतों में मेहनत करते नहीं देखा? बच्चों को गंगा जी में गोता लगाते नहीं देखा? जूते मोजे उतारो, चप्पल पहनो बन्धु! बसंत तो गया, फागुन के रंग ढलो। अब स्वेटर/जैकेट उतारो बन्धु!